"साक्षी जाना नहीं जा सकता"
ॐ !! वंदे गुरु परंपराम् !! ॐ
पूज्य गुरुदेव कहते हैं कि जहाँ तुम्हारी स्मृति, जहाँ तुम्हारी चेतना, जहाँ तुम्हारा ज्ञान जाएगा, तो यह जान जाओगे कि तुम्हारा ज्ञान, तुम्हारी वृत्ति, तुम्हारी सुरति, तुम्हारा ध्यान कहाँ है ? कहाँ गया ? ध्यान जाना भी जाता है और ध्यान से जाना भी जाता है। ध्यान से जाना जाता है और ध्यान भी जाना जाता है। पर, साक्षी जाना नहीं जाता, वह सदा जानता ही जानता है। दृश्य जाना ही जाता है, वह कभी जानता नहीं है। दृश्य कभी किसी को जानता नहीं है। साक्षी कभी नहीं जाना जाता। यह सुरति, यह जीव जानता भी है और जाना भी जाता है।
तीन हिस्से हो गए। जो जाना जाता है, वह शुद्ध जगत् है। उससे तो कुछ आशा ही मत करो। जो जानने में साधन भी है और जाना भी जाता है; वह है हमारी बुद्धि, इन्द्रियाँ, वृत्तियाँ और अहं आदि। यह जीव आभास है। आभास जानने में साधन भी है और आभास ही सबको प्रकाशता भी है। इसलिए, आभास प्रकाशरूप भी है और आभास यह भी जानता है कि मेरा ध्यान, मेरी चेतनता और मेरा ज्ञान कहाँ है? इसलिए, आभास प्रकाश रूप भी है और आभास यह भी जानता है कि मेरा ध्यान, मेरी चेतनता और मेरा ज्ञान कहाँ है ? इसलिए, ज्ञान-भाष्य भी है। जो ज्ञान मालूम पड़ता है; जो ज्ञान मालूम पड़ जाता है; वह कल्पित है। वह ज्ञान की तरह है; लेकिन, वह विशुद्ध ज्ञान नहीं है। जो ज्ञान चलता है; जो ज्ञान मालूम पड़ता है; वह ज्ञान वृत्ति-रूप है और कल्पित है। कल्पित ज्ञान को भी जानो, वह जाना ही जाता है। एक सत् ज्ञान है, दूसरा चित् ज्ञान है, और तीसरा आनन्द ज्ञान है जो कभी भी जाना नहीं जाता। कभी किसी ने भी उसे नहीं जाना; बल्कि, उसी से सब जाना गया है-
'येनेदं सर्वं विजानाति तत् केन कं विजानीयात्' ।
मैं आपसे यह निवेदन करता हूँ कि आत्मा को जानने की इच्छा रखने वालों, कम-से-कम तुम अपने से यह तो पूछो कि आत्मा को जानने की शुरुआत कहाँ से करें ? आत्मा के बारे में जानना चाहिए, उसके जानने की जरूरत है और उसके जानने से कल्याण हो जाता है, यह तुमने कहाँ से सुना ? आत्मा को जानने का प्रयत्न कब से शुरू कर दिया और क्यों शुरू कर दिया ? मैं अपनी दृष्टि से कहता हूँ कि हमने साधु-सन्तों से सुना था कि आत्मा के सम्बन्ध में जानना चाहिए। उन लोगों ने भी कहीं से सुना होगा। चाहे जितने दिन पहले से इसकी शुरुआत हुई हो; लेकिन, वेदों और उपनिषदों के पहले, इस धरती पर कोई ग्रन्थ नहीं था। सबसे पहले उपनिषद् ने या उपनिषद् के ऋषि ने आत्मा को जानने की बातें कहीं थीं।
जिन वेदों ने, जिन उपनिषदों ने, आत्मा को जानने की बातें कहीं थीं, उन्होंने जानने की टैक्नीक भी बताई थी। उस टैक्नीक से विलग होकर, उससे विमुख होकर और भटककर, जो आत्मा को जानने जाएँगे, वे भटकते ही रहेंगे। वे कभी भी आत्मा को जान नहीं सकेंगे । जितनी भी और वाणियाँ हैं, वे चाहे उर्दू में हों, चाहे गुरुमुखी में हों, चाहे हिन्दी में हों, चाहे किसी और के द्वारा कही गई हों; उनसे युक्त हैं, उन्हीं से जुड़ी हैं और उन्हीं से सम्बद्ध हैं। मैं भी जो कहता हूँ, उसके लिए मैं भी उपनिषदों का ऋणी हूँ। मेरे गुरू भी उपनिषदों के ऋणी थे। मेरे गुरू के गुरू भी उपनिषदों के ऋणी थे और उनसे ही उन्होंने जाना था। मैं भी उन्हीं के माध्यम से जान सका हूँ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !!
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