"विवेकचूडामणि ग्रंथ का 218वां श्लोक"
ॐ !! वंदे गुरु परंपराम् !! ॐ
"आत्मस्वरूप-निरूपण"
"श्रीगुरुरुवाच"
असौ स्वसाक्षिको भावो यतः स्वेनानुभूयते ।
अतः परं स्वयं साक्षात्प्रत्यगात्मा न चेतरः ॥ २१८ ॥
अर्थ:-अपना तो यह आत्मा स्वयं ही साक्षी है, क्योंकि यह स्वयं अपने-आप से ही अनुभव किया जाता है। इसलिये इससे परे कोई और अपना साक्षात् अन्तरात्मा नहीं है।
शंकराचार्य द्वारा रचित विवेकचूडामणि का यह श्लोक आत्मस्वरूप की सूक्ष्मतम अनुभूति की ओर संकेत करता है। यहाँ बताया गया है कि जिस सत्ता को हम ‘मैं’ के रूप में पहचानते हैं, वह किसी बाहरी प्रमाण, इन्द्रिय या मन के सहारे नहीं जानी जाती, बल्कि स्वयं अपने द्वारा ही जानी जाती है। दुनिया की हर वस्तु को जानने के लिए एक जानने वाले की आवश्यकता होती है—आँख से रूप जाना जाता है, कान से शब्द, मन से विचार—परंतु आत्मा इन सबका साक्षी है और स्वयं को जानने के लिए किसी अन्य साधन की आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि आत्मा को स्व-साक्षी कहा गया है। इस श्लोक में इसी स्व-साक्षित्व की महिमा को स्पष्ट किया गया है कि आत्मा स्वयं ही अपने अस्तित्व का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
जब हम कहते हैं “मैं हूँ”, तो इस अनुभव में कोई मध्यस्थ नहीं है। ‘मैं हूँ’ का ज्ञान न इन्द्रियों से आता है, न मन से, न बुद्धि से। ये सब तो ज्ञेय हैं—मन बदलता रहता है, विचार आते-जाते रहते हैं, शरीर भी नित्य परिवर्तनशील है—परंतु ‘मैं हूँ’ का अनुभव लगातार एक जैसा रहता है। यह स्थिर अनुभव जिस सत्ता में है, वही आत्मा है। इसका अनुभूति-स्वरूप इतना प्रत्यक्ष है कि इसे सिद्ध करने के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। जैसे प्रकाश को जानने के लिए किसी और प्रकाश की जरूरत नहीं पड़ती, उसी तरह आत्मा को भी किसी बाहरी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। यह स्वयंप्रकाश है। इसलिए श्लोक कहता है कि आत्मा स्व-साक्ष्य से ही प्रमाणित है—असौ स्वसाक्षिको भावो यतः स्वेनानुभूयते।
आगे कहा गया है—अतः परं स्वयं साक्षात्प्रत्यगात्मा न चेतरः—अर्थात् आत्मा के अतिरिक्त कोई दूसरा ‘अन्तरतम साक्षी’ नहीं है। इसका अर्थ यह है कि जिस प्रकार शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, अहंकार आदि सब देखे, अनुभव किए जाते हैं, उसी प्रकार अगर आत्मा को भी कोई और सत्ता देखकर प्रमाणित करे, तो वह देखने वाली सत्ता, आत्मा से भी अधिक आन्तरिक और सूक्ष्म होनी चाहिए। परंतु ऐसा कुछ है ही नहीं। ‘देखने वाला’ और ‘जानने वाला’ सबसे अंदर वही आत्मा है। उसके परे कोई और साक्षी स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि जो भी स्वीकार होगा, वह जानने वाला माना जाएगा और वही आत्मा कहलाएगा। इसीलिए आत्मा ही अंतिम साक्षी है—साक्ष्य-साक्षि-सम्बन्ध का मूल आधार।
जैसे स्वप्न में दृश्य, स्वप्न का मन और अनुभव सब असत्य होते हुए भी जागृत साक्षी से प्रकाशित होते हैं, वैसे ही जगत्, शरीर और मन भी इसी प्रत्यगात्मा-साक्षी के द्वारा प्रकाशित होते हैं। परंतु साक्षी स्वयं कभी अनुभव का विषय नहीं बनता। आँख सब कुछ देख सकती है, पर स्वयं को नहीं देख सकती; दर्पण चाहिए। परंतु आत्मा के मामले में कोई दर्पण नहीं है, क्योंकि आत्मा विषय नहीं, साक्षी है। उसे केवल जाना जाता है, देखा नहीं जाता।
इस सत्य की अनुभूति का फल यह है कि साधक बाहरी आवरणों—शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार—को ‘मैं’ मानना छोड़ देता है और समझता है कि ये सब देखे जाते हैं, इसलिए मैं नहीं हो सकते। जो देखता है, वही मैं हूँ—वही आत्मा हूँ—वही चैतन्य हूँ। यह सीधा, सहज, अद्वितीय अनुभव ही मोक्ष का आधार बनता है। जब साधक यह समझ लेता है कि आत्मा स्वयंप्रकाश है और उससे परे कोई साक्षी नहीं है, तब अद्वैत की अनुभूति स्पष्ट होने लगती है और व्यक्तित्व की सीमाएँ स्वतः मिटने लगती हैं। यही इस श्लोक का गूढ़ और अत्यंत शक्तिशाली संदेश है।
!! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !!