"विवेकचूडामणि ग्रंथ का 217वां श्लोक"
ॐ !! वंदे गुरु परंपराम् !! ॐ
"आत्मस्वरूप-निरूपण"
"श्रीगुरुरुवाच"
तत्साक्षिकं भवेत्तत्तद्यद्यद्येनानुभूयते ।
कस्याप्यननुभूतार्थे साक्षित्वं नोपयुज्यते ॥ २१७ ॥
अर्थ:-जिस-जिसके द्वारा जो-जो अनुभव किया जाता है वह सब उसी के साक्षित्व में कहा जाता है; बिना अनुभव किये पदार्थ में किसी का भी साक्षी होना नहीं माना जाता।
विवेकचूडामणि के इस श्लोक में शंकराचार्य अद्वैत वेदान्त के अत्यंत गूढ़ सिद्धांत—साक्षी-चैतन्य—को सरल और प्रत्यक्ष अनुभव के माध्यम से समझाते हैं। श्लोक का सार यह है कि जिस चेतना के द्वारा सभी वस्तुएँ, अवस्थाएँ, विचार और अनुभव प्रत्यक्ष होते हैं, वही वास्तविक साक्षी है; और जहाँ अनुभव ही नहीं है, वहाँ साक्षित्व की कोई चर्चा नहीं की जा सकती। यह सिद्धांत साधक को बाहरी-पदार्थों से हटाकर अपने भीतर उस नित्य-प्रकाशमान सत्ता की ओर ले जाता है, जो सब अनुभवों की आधारभूत ज्योति है।
हम जीवन में जो कुछ भी देखते, सुनते, सोचते या अनुभव करते हैं—वह सब किसी ‘जानने वाले’ के द्वारा ही जाना जाता है। यह जानने वाला न तो शरीर है, न ही मन, क्योंकि शरीर स्वयं देखा जाता है और मन भी विचारों, भावनाओं और स्मृतियों के रूप में निरंतर परिवर्तित होता हुआ अनुभव का विषय बनता है। जो अनुभव का विषय है, वह साक्षी नहीं हो सकता। श्लोक कहता है कि “जिस-जिसके द्वारा जो-जो अनुभव किया जाता है”—अर्थात् अनुभव होने की क्रिया स्वयं यह सिद्ध करती है कि एक अपरिवर्तनीय सत्ता उपस्थित है जो अनुभवों को प्रकाशित कर रही है। जब आंख रूपों को देखती है, कान ध्वनियों को सुनते हैं, मन विचारों को उठाता है—इन सबके पीछे एक शांत, अचल, स्वयं-प्रकाशित चैतन्य है जो इन परिवर्तनों को जानता है। वही ‘साक्षी’ है।
दूसरा भाग कहता है कि “कस्याप्यननुभूतार्थे साक्षित्वं नोपयुज्यते”—अर्थात् जहाँ कोई अनुभव नहीं है, वहाँ साक्षित्व का प्रश्न ही नहीं उठता। साक्षी वही कहा जाता है जो प्रत्यक्ष रूप से किसी वस्तु या घटना को प्रकाशित करता हो। उदाहरण के लिए, यदि कोई वस्तु अंधकार में पड़ी रहे और कोई उसे न देखे, तो ‘देखने वाला’ वहाँ उपस्थित होने पर ही देखने का विषय उठता है। ठीक इसी प्रकार आत्मा का साक्षित्व अनुभव-जगत में उसकी उपस्थिति से प्रमाणित होता है। अनुभवों का होना संकेत देता है कि अनुभवकर्ता अवश्य है। यदि साक्षी न होता, तो न ज्ञान होता, न अज्ञान की अनुभूति, न सुख, न दुख, न जाग्रत, न स्वप्न, न सुषुप्ति—कुछ भी नहीं।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि साक्षी किसी वस्तु का साक्षी ‘बनता’ नहीं है; बल्कि उसकी स्वभाविक प्रकाशता से सब कुछ प्रकाशित होता है। जैसे सूर्य की उपस्थिति मात्र से सारे वस्तु दृश्य होती हैं, सूर्य को देखने का कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता, वैसे ही आत्मा की चैतन्य-स्वरूप प्रकृति से सभी अनुभव प्रकट होते हैं। शरीर और मन उसके द्वारा अनुभूत होते हैं, इसलिए वे आत्मा नहीं हो सकते। साक्षी सदा अचल, निरविकार, निर्विशेष और स्वतंत्र है। अनुभव के विविध रूप—सुख-दुख, विचार-स्मृति, चेतना-अचेतना—ये सभी बदलते रहते हैं, परंतु इनके जानने वाले में कोई परिवर्तन नहीं आता।
इस श्लोक का उद्देश्य साधक को यह स्पष्ट रूप से समझाना है कि आत्मा किसी कल्पित वस्तु या दार्शनिक सिद्धांत का नाम नहीं है, बल्कि वही तत्त्व है जो इस क्षण भी सभी अनुभवों को प्रकाशित कर रहा है। मन और इंद्रियों से हटकर यदि साधक अपने भीतर इस साक्षी-स्वरूप की ओर मुड़े, तो अनुभव होगा कि वह कभी जन्मा नहीं, कभी बदला नहीं, कभी नष्ट नहीं होता। वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चैतन्य-रूप आत्मा है—जो संसार के सारे परिवर्तन को देखता है, पर स्वयं अपरिवर्तनीय रहता है। यही साक्षित्व आत्मानुभूति और ब्रह्मज्ञान का द्वार है।
!! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !!