"विवेकचूडामणि ग्रंथ का 219वां श्लोक"
ॐ !! वंदे गुरु परंपराम् !! ॐ
"आत्मस्वरूप-निरूपण"
"श्रीगुरुरुवाच"
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु स्फुटतरं योऽसौ समुज्जृम्भते प्रत्यग्रूपतया सदाहमहमित्यन्तः स्फुरन्नैकधा । नाना कारविकारभागिन इमान्पश्यन्नहंधीमुखान् नित्यानन्दचिदात्मना स्फुरति तं विद्धि स्वमेतं हृदि ॥ २१९ ॥
अर्थ:-जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति- इन तीनों अवस्थाओं में जो अन्तःकरण के भीतर सदा अहम् अहम् (मैं-मैं) रूप से अनेक प्रकार स्फुरित होता हुआ प्रत्यग्रूप से स्पष्टतया प्रकाशित होता है और अहंकार से लेकर प्रकृति के इन नाना विकारों को साक्षीरूप से देखता हुआ नित्य चिदानन्दरूप से स्फुरित होता है, उसी को तू अपने अन्तःकरण में विराजमान अपना-आप समझ ।
विवेकचूडामणि के इस अत्यंत गूढ़ और महत्त्वपूर्ण श्लोक में भगवान् शंकराचार्य ने आत्मा के स्वरूप को तीनों अवस्थाओं—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—के आधार पर अत्यंत सूक्ष्म विवेक के साथ प्रकट किया है। सामान्यतः मनुष्य अपने अनुभवों को ही सत्य मानता है, परन्तु इन सभी अवस्थाओं का आधार जो अपरिवर्तनशील, सदा-प्रकाशमान सत्ता है, वही आत्मा है। यही श्लोक उस आत्मस्वरूप को प्रत्यक्ष रूप से पहचानने का मार्ग दिखाता है। जब मनुष्य जाग्रत अवस्था में रहता है, तब ‘मैं’ भाव इंद्रिय और मन से संयुक्त होकर देहाभिमान के साथ प्रकट होता है—‘मैं देख रहा हूँ’, ‘मैं बोल रहा हूँ’, ‘मैं चल रहा हूँ’ इत्यादि। स्वप्न अवस्था में वही 'मैं' देह के बिना भी अपने अस्तित्व को बनाए रखता है और स्वप्न-जगत के विविध अनुभवों का साक्षी बनता है। वहीं सुषुप्ति अवस्था में जब मन, बुद्धि, इंद्रियाँ सब पूर्णतया लीन हो जाती हैं, तब भी ‘मैं रहा’—यह अनुभूति सुषुप्ति से जागने पर हर व्यक्ति सहज रूप से करता है। इन तीनों अवस्थाओं में यदि कोई तत्व समान, अविचल और निरंतर प्रकट होता है, वह यही ‘अहम्-अहम्’ की अनुभूति है—प्रत्यगात्मा, जो प्रत्येक के भीतर सदा प्रकाशित है।
यह ‘अहम्-अहम्’ भाव कोई अहंकार नहीं है। अहंकार वस्तुतः मन का विकार है, जो ‘मैं’ को देह और मन के साथ जोड़कर मिथ्या पहचान बना देता है। परन्तु शंकराचार्य जिस 'अहम्' की ओर संकेत कर रहे हैं, वह देह-मन से रहित, पूर्ण शुद्ध चेतना स्वरूप है—जो सिर्फ ‘मैं हूँ’ के रूप में चमकता है। यही प्रत्यगात्मा, स्वयं में प्रकाशित होने वाला स्वरूप है, जो न कभी जन्म लेता है, न परिवर्तन को प्राप्त होता है। यह तीनों अवस्थाओं में समान रूप से विद्यमान रहता है, पर प्रत्येक अवस्था का अनुभव इससे भिन्न होता है। जाग्रत् में यह बाह्य अनुभवों का साक्षी है, स्वप्न में आभ्यंतर अनुभवों का साक्षी है, और सुषुप्ति में अनुभव के अभाव का भी साक्षी है। यह साक्षित्व ही आत्मा का सहज, नित्य स्वभाव है, जो न कभी ढँकता है, न बदलता है, बल्कि मन के आवरण हटने पर और भी स्पष्ट हो उठता है।
श्लोक में कहा गया है कि यही आत्मा अनेक प्रकार के विकारों—अहंकार, मन, बुद्धि, चित्त, और प्रकृति के समस्त परिवर्तनों—को साक्षी-भाव से देखता है। अर्थात यह स्वयं कभी उनसे प्रभावित नहीं होता, बल्कि उनका अनुभव मात्र करता है। जिस प्रकार सूर्य बादलों के आने से न बदलता है, न उनसे स्पर्शित होता है, उसी प्रकार यह आत्मा भी देह-मन के परिवर्तनों से अप्रभावित रहता है। इसका नित्यता और चिदानन्दरूप होना इसी तथ्य से सिद्ध होता है कि अनुभवों का आना-जाना तो सतत चलता रहता है, परंतु अनुभव करने वाली सत्ता अटल रहती है। जो सत्ता जाग्रत के सुख-दुःख देखती है, वही स्वप्न के भ्रमित दृश्य भी देखती है, और वही गहरी निद्रा के अभाव की स्थिति को भी जानती है। इसलिए यह स्पष्ट है कि चेतना का वास्तविक स्वरूप इन अनुभवों से परे है, केवल उनका साक्षी है।
अंत में आचार्य कहते हैं—“उस आत्मा को तू अपने हृदय में जान।” इसका अर्थ है कि आत्मा किसी बाहरी स्थान पर खोजने योग्य वस्तु नहीं है। वह स्वयं हमारे भीतर, ‘मैं’ की निरंतर अनुभूति के रूप में पहले से ही उपस्थित है। उसे पाने के लिए किसी विशेष क्रिया की आवश्यकता नहीं, बल्कि उसके ऊपर चढ़े हुए अज्ञान के आवरण को हटाने की आवश्यकता है। जब मन शांत होता है और विवेक जाग्रत होता है, तब यही प्रत्यगात्मा अपनी पूर्ण चिदानन्दरूप में प्रकट होने लगता है। यही आत्मा का साक्षात अनुभव है, जिसे जानकर मनुष्य मुक्त हो जाता है।
!! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !!