को वा दरिद्रो हि विशालतृष्णः श्रीमांश्च को यस्य समस्ततोषः।
जीवन्मृतः कस्तु निरुद्यमो यः किं वामृतं स्यात्सुखदा निराशा । ५।
प्रश्न:-दरिद्र कौन है ?
और धनवान् कौन है ?
(वास्तवमें) जीते-जी मरा कौन है?
और अमृत क्या हो सकता है ?
उत्तर:-भारी तृष्णावाला।
जिसे सब तरह से संतोष है।
जो पुरुषार्थ हीन है।
सुख देने वाली निराशा (आशा से रहित होना)।
व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा प्रस्तुत यह श्लोक मानव जीवन के चार अत्यन्त महत्वपूर्ण सत्य प्रकट करता है—दरिद्रता, वास्तविक सम्पदा, जीवन का मृतवत् होना और अमृत की सच्ची परिभाषा। संसार में लोग सामान्यतः धन, वस्तुएँ और बाहरी उपलब्धियों के आधार पर किसी को निर्धन या धनी मानते हैं, परन्तु आचार्य शंकर इस दृष्टिकोण को उलटकर बताते हैं कि आध्यात्मिक दृष्टि भौतिक मापदण्डों पर नहीं, अन्तःकरण की अवस्था पर आधारित होती है। जो व्यक्ति भारी तृष्णा, निरन्तर चाह, लालसा और असंतोष से घिरा हुआ है, वही वास्तविक दरिद्र है। चाहे उसके पास कितना ही धन क्यों न हो, यदि उसके भीतर ‘और चाहिए’ की आग जल रही है, तो वह सदा ही भिखारी की तरह रहता है। तृष्णा मनुष्य की शान्ति को नष्ट करती है; वह उसके विचारों को चंचल बनाती है, और उसे वर्तमान में प्रसन्न रहने से रोकती है। इसी कारण शंकराचार्य कहते हैं कि ‘‘विशालतृष्णः’’—जिसकी इच्छाएँ अत्यन्त विशाल हैं—वही दरिद्र है, क्योंकि उसकी आन्तरिक भूख कभी समाप्त नहीं होती।
इसके विपरीत, वास्तव में धनवान् वह है जिसके भीतर समस्त प्रकार का संतोष है। संतोष एक ऐसा रत्न है जिसके आगे बाहरी सम्पदा फीकी पड़ जाती है। जिस मनुष्य ने जीवन से, अपनी परिस्थितियों से और ईश्वर की इच्छा से संतुष्टि का भाव विकसित कर लिया, वह सच्चा धनी है, क्योंकि उसकी प्रसन्नता किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं रहती। शास्त्रों में कहा गया है—“संतोषामृततृप्तानां न कुतः चिन्तामूढता”—अर्थात् जो संतोष रूपी अमृत से तृप्त हैं, उन्हें न कोई चिन्ता होती है, न कोई मोह। ऐसा व्यक्ति भीतर से सम्पन्न होता है और उसका सुख स्थायी होता है।
आचार्य आगे कहते हैं कि जीवित होते हुए भी मृत वही है जो निरुद्यम—अर्थात् पुरुषार्थ और प्रयत्न रहित है। वे स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति न कोई लक्ष्य रखता है, न किसी उच्च आदर्श के लिए उद्यम करता है, न धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष में से किसी की ओर सही प्रकार से बढ़ता है, उसकी जीवन-शक्ति निष्क्रियता में नष्ट हो जाती है। आलस्य, प्रमाद और निरुद्यमता मनुष्य को भीतर से शिथिल बना देती है, जिससे उसकी चेतना मानो मृत हो जाती है। शास्त्रों में आलस्य को तमोगुण का सबसे बड़ा द्वार बताया गया है, और ऐसा जीवन वास्तव में ‘जीवन्मृतत्व’—जीते-जी मृत अवस्था—का उदाहरण है। जीवन का मूल्य प्रयत्न, जागरूकता और आत्मोन्नति के निरन्तर प्रयास में है।
शंकराचार्य अंत में कहते हैं कि संसार में यदि कोई वस्तु अमृत कही जा सकती है, तो वह है ‘निराशा’—अर्थात् आशाओं से मुक्त होना। यह ‘निराशा’ सामान्य जीवन की हतोत्साहपूर्ण निराशा नहीं, बल्कि इच्छाओं और अपेक्षाओं से मुक्त वैराग्य की अवस्था है। जब मनुष्य किसी फल की आशा नहीं करता, किसी लाभ की अपेक्षा नहीं रखता, और न बाहरी वस्तुओं के प्रति आसक्त होता है, तब उसके भीतर अद्भुत शान्ति और सुख का उदय होता है। यह सुख ही वास्तविक अमृत है—क्योंकि यह नित्य, निर्भरता रहित और अविनाशी है। आशा जितनी अधिक होती है, उतनी ही अधिक पीड़ा जन्म लेती है; और जब अपेक्षाएँ छूटती हैं, तो हृदय भारमुक्त होकर सहज आनन्द में डूब जाता है।
इस प्रकार शंकराचार्य इस श्लोक में मानव जीवन की चार महत्वपूर्ण सच्चाइयों का अत्यन्त सरल और गम्भीर रूप में विवेचन करते हैं—तृष्णा से मुक्त होना ही वास्तविक सम्पन्नता है; संतोष ही धन है; पुरुषार्थ ही जीवन है; और अपेक्षाओं का क्षय ही अमृतमय सुख का मार्ग है।