शेते सुखं कस्तु समाधिनिष्ठो जागर्ति को वा सदसद्विवेकी ।
के शत्रवः सन्ति निजेन्द्रियाणि तान्येव मित्राणि जितानि यानि । ४ ।
प्रश्न:-(वास्तवमें) सुख से कौन सोता है ?
और कौन जागता है ?
शत्रु कौन हैं ?
उत्तर:-जो परमात्मा के स्वरूप में स्थित है।
सत् और असत्के तत्त्व का जानने वाला। अपनी इन्द्रियाँ; परंतु जो जीती हुई हों तो वही मित्र हैं।
व्याख्या:-जो व्यक्ति समाधि में स्थित होता है—अर्थात् जिसने मन की चंचलता को पूर्णतः जीतकर परमात्मा के स्वरूप में विश्राम पाया है—वही वास्तव में सुखपूर्वक सोता है। यहाँ ‘सोना’ साधारण नींद नहीं है; यह उस तल्लीन अवस्था का प्रतीक है जिसमें जगा हुआ मन भी संसार के द्वंद्वों से अलिप्त रहता है। ऐसा साधक जाग्रत अवस्था में भी शोक, भय, हर्ष, विषाद, राग-द्वेष जैसे मानसिक विक्षेपों से मुक्त होकर आत्मानंद में स्थित होता है। उसके लिए जीवन एक नितांत शांत, अविकार रहित अनुभव बन जाता है। इसलिए शंकराचार्य बताते हैं कि ‘समाधिनिष्ठ’ ही सच्चे अर्थ में आनंदपूर्वक ‘शेते’—अर्थात् विश्राम करता है, क्योंकि उसका विश्राम शरीर का नहीं, मन का नहीं, बल्कि आत्मा में पूर्ण प्रतिष्ठा का है।
इसी प्रकार ‘जागृति’ का भी यहाँ विशिष्ट अर्थ है। सामान्य मनुष्य आँखें खुली रखते हुए भी वास्तविकता से सोया रहता है; वह सत् और असत् का भेद नहीं जानता, नित्य-अनित्य का विवेक नहीं कर पाता। किन्तु जो सत्—अर्थात् परम सत्य, आत्मा, ब्रह्म—और असत्—अस्थायी, परिवर्तनशील, नश्वर जगत—के बीच स्पष्ट भेद देखता है, वही वास्तव में ‘जागृत’ है। ऐसा विवेकी साधक संसार का उपभोग करता हुआ भी उससे बंधता नहीं, क्योंकि वह जानता है कि दृश्य जगत केवल नाम-रूप का प्रवाह है और इसका वास्तविक अस्तित्व आत्मचैतन्य पर निर्भर है। जब यह जानना दृढ़ हो जाता है तभी मनुष्य अज्ञान के निद्रा-जाल से पृथक होता है। यही अवस्था शास्त्रों में ‘विवेक-जागृति’ कही गई है।
इसके बाद शंकराचार्य मनुष्य के ‘शत्रु’ और ‘मित्र’ को भी बड़े अद्भुत और सूक्ष्म रूप में परिभाषित करते हैं। सामान्यतः हम बाहरी संसार में शत्रु खोजते हैं—जो हमें प्रतिकूल लगता है, विरोध करता है, अपमानित करता है या हमारी इच्छाओं के विरुद्ध चलता है। परंतु अद्वैत वेदांत की दृष्टि में असली शत्रु बाहर नहीं, भीतर हैं। ये शत्रु हमारे अपने इन्द्रिय-वर्ग हैं—आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा—जो विषयों की ओर दौड़कर मनुष्य को संसार के जाल में फंसाती हैं। इन्द्रियाँ स्वभावतः बहिर्मुख हैं; वे आकर्षण, आसक्ति, भोग, लालसा और विषय-प्रवृत्ति की ओर ले जाती हैं। जब ये अनियंत्रित होती हैं, तब वे साधक को पतन की ओर खींचती हैं और उसकी विवेकशक्ति को ढँक देती हैं। अतः इन्हीं को शास्त्र ‘निजेन्द्रियाणि’—अपने-अपने शत्रुओं के रूप में—निर्देशित करते हैं।
परंतु यही इन्द्रियाँ जब ज्ञान, संयम, अभ्यास और ध्यान के द्वारा नियंत्रित हो जाती हैं, तो ये शत्रु ही हमारे सबसे बड़े मित्र बन जाती हैं। जीती हुई इन्द्रियाँ साधक को सतत भीतर की ओर लौटने में सहायता करती हैं। वे मन को स्थिर करती हैं, उसे अनुशासित बनाती हैं, और जीवन को संयम, पवित्रता तथा आत्मिक दृढ़ता से भर देती हैं। एक बार इन्द्रियाँ विषय-वासनाओं से मुक्त हो जाएँ, तो वे आत्म-साक्षात्कार की साधना में सहायक बनती हैं, न कि बाधक। इसलिए शंकराचार्य कहते हैं—जीती हुई इन्द्रियाँ ही मित्र हैं।
अन्ततः इस श्लोक का सार यही है कि जीवन का वास्तविक सुख और जागृति बाह्य परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आंतरिक परिष्कार से उत्पन्न होती है। समाधि की स्थिति में रहने वाला साधक ही सच्चा सुखी है, विवेकी ही सच्चा जागृत है, और अपनी ही इन्द्रियाँ—असंयम की अवस्था में शत्रु तथा संयम में मित्र—मानव जीवन की दिशा निर्धारित करती हैं। यह श्लोक साधक को भीतर की ओर मोड़ने वाला महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है।