पाशो हि को यो ममताभिमानः सम्मोहयत्येव सुरेव का स्त्री।
को वा महान्धो मदनातुरो यो मृत्युश्च को वापयशः स्वकीयम् । ६ ।
प्रश्न:-वास्तव में फाँसी क्या है ?
मदिरा की तरह क्या चीज निश्चय ही मोहित कर देती है ?
और बड़ा भारी अन्धा कौन है ?
मृत्यु क्या है ?
उत्तर:-जो 'मैं' और 'मेरा 'पन है।
नारी ही।
जो कामवश व्याकुल है।
अपनी अपकीर्ति।
व्याख्या:-यह श्लोक शंकराचार्य द्वारा मानवीय दुर्बलताओं, आसक्तियों और अध्यान्त अज्ञान के परिणामों का अत्यन्त सूक्ष्म रूप से विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यहाँ गुरु शिष्य को सरल प्रश्नोत्तर शैली में जीवन के गहन सत्य समझा रहे हैं। शिष्य पूछता है—वास्तव में फाँसी क्या है? कौन-सी वस्तु निश्चय ही मदिरा की तरह मोह में डाल देती है? बड़ा अन्धा कौन है? और मृत्यु क्या है? गुरु इन प्रश्नों का उत्तर केवल शब्दों से नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य के आधार पर देते हैं, जो हर साधक के लिए मार्गदर्शक हैं।
फाँसी सामान्यतः एक बाहरी दण्ड को दर्शाती है, परन्तु शंकराचार्य कहते हैं कि वास्तविक फाँसी ‘ममता और अभिमान’ है—‘मैं’ और ‘मेरा’ की भावना। यह अहंकार ही जीव को बार-बार संसार में बाँधता है। हम जो भी कार्य करते हैं, उसमें ‘मेरी वस्तु, मेरा परिवार, मेरी उपलब्धि’ जैसी धारणाएँ मन को जकड़ लेती हैं। यही ममता का पाश है। जैसे फाँसी का फंदा गले को पकड़ लेता है, उसी प्रकार अहंकार और स्वार्थ की भावना जीव के वास्तविक स्वरूप को दबा देती है। यह पाश जीव को सत्य-स्वरूप से दूर रखकर संसार के भय, शोक और संघर्ष में उलझाए रखता है। जब तक यह ‘मैं-मेरा’ की गाँठ नहीं खुलती, तब तक आत्मा स्वतन्त्रता का अनुभव नहीं कर सकती।
इसके बाद शिष्य पूछता है—वह कौन-सी वस्तु है जो मदिरा की भाँति निश्चित रूप से मन को मोहित कर देती है? उत्तर है—स्त्री। यह उत्तर सामान्य स्त्री-विरोध नहीं है, बल्कि ‘कामवासना’ के प्रतीक रूप में स्त्री का उल्लेख है। वेदांत में ‘नारी’ यहाँ विषय-भोग की आकर्षक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है। जैसे मदिरा विवेक को छीन कर मनुष्य को तर्कहीन बना देती है, वैसे ही विषय-वासनाएँ मन को मोहग्रस्त कर देती हैं। यह आकर्षण केवल पुरुष के लिए नहीं, बल्कि हर जीव के लिए किसी न किसी रूप में उपस्थित है—धन के लिए, स्वरूप के लिए, सम्मान के लिए, इन्द्रिय-सुख के लिए। शंकराचार्य संकेत देते हैं कि यह मोह ही साधक की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है।
शिष्य पूछता है—सबसे बड़ा अन्धा कौन है? उत्तर है—जो कामवासना से व्याकुल है, वही महाअन्ध है। शारीरिक दृष्टि का अन्धापन उतना भीषण नहीं जितना इच्छा का अन्धापन। वासना मनुष्य की निर्णय-शक्ति को नष्ट कर देती है, उसे वास्तविकता से दूर कर देती है। जो व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ जैसी वासनाओं में फँस जाता है, उसका विवेक नष्ट हो जाता है। वह सत्य और असत्य का भेद नहीं कर पाता, न ही अपने कल्याण की ओर बढ़ पाता है। यही कारण है कि वेदांत काम को ‘महाशत्रु’ कहता है।
अन्तिम प्रश्न है—वास्तव में मृत्यु क्या है? उत्तर है—अपनी अपकीर्ति। मनुष्य केवल शरीर से नहीं मरता। शरीर की मृत्यु एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, परन्तु वास्तविक मृत्यु तब मानी जाती है जब मनुष्य अपनी प्रतिष्ठा, चरित्र और सत्य-विरुद्ध आचरण से अपनी आन्तरिक पवित्रता को खो देता है। अपकीर्ति आत्मा के उत्कर्ष को रोकती है और मनुष्य के जीवन को नैतिक रूप से ‘मृत’ बना देती है। इसीलिए कहा गया है—धन का नाश पुनः हो सकता है, स्वास्थ्य लौट सकता है, परन्तु चरित्र की हानि आत्मिक मृत्यु के समान है।
इस प्रकार यह श्लोक हमें सिखाता है कि वास्तविक पाश बाहर नहीं, भीतर है; वास्तविक मदिरा बाहरी पेय नहीं, इच्छाओं का उफान है; वास्तविक अन्धापन आँखों का नहीं, वासनाओं का है; और वास्तविक मृत्यु शरीर की नहीं, चरित्र के पतन की है। यह ज्ञान साधक को भीतर की शुद्धि, विवेक और आत्मनिष्ठा की ओर ले जाता है।