को वा गुरुर्यो हि हितोपदेष्टा शिष्यस्तु को यो गुरुभक्त एव ।
को दीर्घरोगो भव एव साधो किमौषधं तस्य विचार एव।७।
प्रश्न:-गुरु कौन है ?
शिष्य कौन है ?
बड़ा भारी रोग क्या है?
उसकी दवा क्या है?
उत्तर:-जो केवल हित का ही उपदेश करने वाला है।
जो गुरु का भक्त है, वही।
हे साधो ! बार-बार जन्म लेना ही।
परमात्मा के स्वरूप का मनन ही।
व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा प्रस्तुत यह प्रश्नोत्तरी अत्यंत गहन आध्यात्मिक सत्य को सरल भाषा में उजागर करती है। इसमें गुरु, शिष्य, संसाररूपी रोग और उसके उपाय का ऐसा सूक्ष्म विवेचन है जो साधक को आत्मचिन्तन की ओर ले जाता है। श्लोक में कहा गया है—गुरु कौन है? उत्तर मिलता है—जो केवल हित का ही उपदेश करने वाला है। इसका अर्थ यह है कि गुरु वह नहीं जो केवल शास्त्रों का ज्ञान रखता हो या बाहरी आडम्बर दिखाता हो, बल्कि वह है जो शिष्य के कल्याण के लिए हितकारी, सत्य और कल्याणकारी मार्ग ही बताए। गुरु का हृदय करुणा से भरा होता है, उसका उपदेश किसी स्वार्थ, अहंकार या लोभ से प्रेरित नहीं होता। वह शिष्य को उसके वास्तविक स्वरूप—आत्मा—का बोध कराने के लिए उपदेश देता है। उसके शब्द मार्गदर्शक दीपक होते हैं, जो अज्ञानरूपी अन्धकार को काटते हैं।
शिष्य कौन है? श्लोक कहता है—जो गुरु का भक्त है, वही शिष्य है। यहाँ ‘भक्ति’ का अर्थ अन्धानुकरण या दास्य भाव नहीं है, बल्कि श्रद्दा, समर्पण और विनम्रता है। शिष्य वह है जो अपने अहंकार को छोड़कर गुरु के वचनों को ग्रहण करता है, उन्हें मनन करता है और जीवन में उतारता है। सच्चा शिष्य जानता है कि गुरु का उपदेश उसका कल्याण करने वाला है, इसलिए वह उन्हें पूर्ण विश्वास से स्वीकार करता है। शंकराचार्य इस बात पर बल देते हैं कि गुरु और शिष्य का संबंध साधारण नहीं, बल्कि आत्मोन्नति का सेतु है। जिस शिष्य में श्रद्दा नहीं, वह चाहे कितना भी ज्ञान पढ़ ले, वह भीतर परिवर्तन नहीं ला सकता।
श्लोक आगे कहता है—बड़ा भारी रोग क्या है? उत्तर है—हे साधो! बार-बार जन्म लेना ही। यह संसारचक्र ही मनुष्य के लिए सबसे बड़ा रोग है। जब तक व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचानता, तब तक वह कर्म, वासनाओं और अज्ञान के कारण जन्म-मरण के अनंत चक्र में घूमता रहता है। यह चक्र ही ‘दीर्घरोग’ है—अत्यंत पुराना, गहरा और कठिन रोग। सामान्य रोग एक जीवन तक सीमित होते हैं, परंतु यह रोग अनादि काल से जीव को जकड़े हुए है।
अन्त में पूछा गया—उसकी दवा क्या है? उत्तर है—परमात्मा के स्वरूप का मनन ही। यह मनन केवल बौद्धिक सोच नहीं है, बल्कि निरंतर स्मरण, चिंतन और आत्मस्वरूप की खोज है। जब साधक यह समझने लगता है कि वह नश्वर शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध चैतन्य है, तब भीतर का अज्ञान मिटने लगता है। यह मनन वैराग्य को जन्म देता है, विवेक को जागृत करता है और अंततः आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाता है। जैसे सूर्य उगने पर अंधकार स्वयं हट जाता है, वैसे ही आत्म-चिन्तन और ब्रह्म-विचार से अज्ञान हट जाता है और जन्म-मरण रूपी रोग स्वतः समाप्त हो जाता है।
इस प्रकार यह श्लोक बताता है कि जीवन में सही गुरु का होना, उनके प्रति श्रद्धा रखना, संसारचक्र को पहचानना और निरंतर आत्मचिन्तन करना—यही आध्यात्मिक यात्रा का सार है।