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सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

आदि शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी (मणिरलमाला) का 9वा श्लोक

के हेतवो ब्रह्मगतेस्तु सन्ति सत्सङ्गतिर्दानविचारतोषाः

के सन्ति सन्तोऽखिलवीतरागा अपास्तमोहाः शिवतत्त्वनिष्ठाः । ९ ।

प्रश्न:-परमात्मा की प्राप्ति के | क्या-क्या साधन हैं ?
महात्मा कौन हैं ?

उत्तर:-सत्संग, सात्त्विक दान, परमेश्वर के स्वरूप का मनन और संतोष ।

सम्पूर्ण संसार से जिन की आसक्ति नष्ट हो गयी है, जिनका अज्ञान नाश हो चुका है और जो कल्याण रूप परमात्म-तत्त्व में स्थित हैं।

व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा रचित यह श्लोक साधना-मार्ग के अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर बड़े ही सरल, व्यावहारिक और गूढ़ ढंग से देता है। साधक पूछता है—परमात्मा की प्राप्ति के क्या उपाय हैं, और महात्मा किसे कहा जाता है? आदिशंकराचार्य इन दोनों प्रश्नों का उत्तर संक्षिप्त शब्दों में देते हुए साधना के सार को प्रकट करते हैं। वे बताते हैं कि ब्रह्मज्ञान की ओर ले जाने वाले चार प्रमुख साधन हैं—सत्संग, दान, विचार और संतोष। ये चारों साधन साधक के अन्तःकरण को शुद्ध करते हैं, मन को स्थिर बनाते हैं और धीरे-धीरे उसे ब्रह्म-तत्त्व के बोध के लिये योग्य बनाते हैं।

सर्वप्रथम आता है सत्संग—सज्जनों, संतों और ज्ञानी महापुरुषों का संग। शंकराचार्य मानते हैं कि साधना की सम्पूर्ण प्रक्रिया में सत्संग एक दिव्य अग्नि की तरह है, जो अन्तःकरण के मल को जलाकर शुद्ध करती है। जब साधक गुरुजन के वचनों को सुनता है, शास्त्रों का मनन करता है और श्रेष्ठ आचरण वाले लोगों के सम्पर्क में रहता है, तब उसका मन स्वतः निर्मल होने लगता है। सत्संग न केवल ज्ञान देता है, बल्कि साधक को उन सभी विकारों और भ्रमों से बचाता है, जो संसार की ओर खींचते हैं। यही कारण है कि संतों ने सत्संग को मोक्ष-मार्ग का प्रवेश-द्वार माना है।

दूसरा साधन है सात्त्विक दान—ऐसा दान जो निष्काम हो, केवल पुण्य के लिए नहीं, बल्कि हृदय की करुणा और उदारता से किया गया हो। दान मन को उर्ध्वगामी बनाता है, अहंकार को कम करता है और ‘मेरा-तेरा’ की भावना को मिटाता है। जब व्यक्ति दान करता है, वह भीतर से हल्का होता है, और यही हल्कापन उसे परमात्मा की ओर बढ़ने में सहायक होता है। शंकराचार्य का आशय यह है कि दान केवल वस्तुओं का नहीं, बल्कि समय, श्रम, सेवा और सद्भावना का भी होना चाहिए।

तीसरा साधन है विचार—परमात्मा के स्वरूप पर निरन्तर मनन। विचार का अर्थ है आत्मा-ब्रह्म की महत्ता, उनकी एकता और संसार की नश्वरता का बार-बार चिंतन करना। यह चिंतन धीरे-धीरे साधक के भीतर दृढ़ विवेक उत्पन्न करता है। जब मन परम तत्त्व पर स्थिर होने लगता है, तो संसार की आकर्षक चीजें अपना प्रभाव खोने लगती हैं। विचार ही वह शक्ति है जो अन्तःकरण में प्रकाश उत्पन्न करती है।

चौथा साधन है संतोष—जिसके द्वारा मन की चंचलता शांत होती है। संतोष का अर्थ है—जो उपलब्ध है उसमें संतुष्ट रहकर अपने लक्ष्य पर स्थिर रहना। असंतोष मन को भटकाता है, जबकि संतोष साधक को स्थिरता और शांति प्रदान करता है। संतोष से मन सहज रूप से भीतर की ओर मुड़ता है, और परमात्मा के स्मरण में स्थित होने लगता है।

दूसरे प्रश्न के उत्तर में शंकराचार्य महात्मा की स्पष्ट परिभाषा देते हैं। वे कहते हैं—वे ही संत हैं जिन्होंने सम्पूर्ण संसार-वस्तुओं से आसक्ति का परित्याग कर दिया है। जिनके अन्तःकरण से मोह और अज्ञान की मलिनता दूर हो चुकी है। जिनका मन सदैव शिव-तत्त्व में, परम कल्याण स्वरूप ब्रह्म में स्थित रहता है। ऐसे महात्मा स्वयं प्रकाशित दीपक की तरह होते हैं, जो न केवल स्वयं को प्रकाशित करते हैं, बल्कि दूसरों को भी प्रकाश प्रदान करते हैं। उनका जीवन संसार के लिए आदर्श और साधकों के लिए प्रेरणा बन जाता है।

इस प्रकार यह श्लोक साधना और सन्तत्व, दोनों के स्वरूप को संक्षेप में अत्यंत स्पष्टता के साथ सामने रखता है।