किं भूषणाद्भूषणमस्ति शीलं तीर्थं परं किं स्वमनो विशुद्धम् ।
किमत्र हेयं कनकं च कान्ता श्राव्यं सदा किं गुरुवेदवाक्यम्। ८ ।
प्रश्न:-भूषणों में उत्तम भूषण | क्या है ? सबसे उत्तम तीर्थ क्या है? इस संसार में त्यागने योग्य क्या है ? सदा (मन लगाकर) सुनने योग्य क्या है ?
उत्तर:-उत्तम चरित्र । अपना मन जो विशेष रूप से शुद्ध किया हुआ हो। काञ्चन और कामिनी। वेद और गुरु का वचन।
व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा प्रस्तुत यह प्रश्नोत्तरी आत्मचिंतन और आचरण की शुद्धता का अद्वितीय उपदेश देती है। श्लोक में कहा गया है कि संसार के बाहरी आडंबरों और आकर्षणों से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण मनुष्य का आन्तरिक रूप, उसका चरित्र और उसकी साधना है। वस्त्र, गहने, आभूषण आदि केवल शरीर को सजाते हैं, परंतु मनुष्य को सच्चे अर्थों में सुशोभित यदि कोई करता है, तो वह उसका शील, अर्थात् उसका उत्तम आचार-विचार, सत्य, करुणा, नम्रता, संयम और पवित्र आचरण है। जो व्यक्ति सच्चरित्र है, वही वास्तव में अलंकृत है; और जिसके जीवन में चरित्र नहीं, उसके सारे बाहरी गहने भी अर्थहीन हैं। इसी कारण शंकराचार्य कहते हैं कि भूषणों में सर्वश्रेष्ठ भूषण शील है।
इसके बाद वे पूछते हैं कि सबसे उत्तम तीर्थ कौन-सा है। तीर्थ सामान्यतः उन स्थानों को कहा जाता है जहाँ जाकर व्यक्ति पापों का क्षय करता है और मन को शुद्ध करता है। परंतु बाहरी तीर्थ तभी फल देते हैं जब भीतर भी शुद्धता का भाव हो। इसलिए शंकराचार्य स्पष्ट कहते हैं कि सर्वोत्तम तीर्थ कोई बाहर का स्थान नहीं, बल्कि अपना ही मन, जो विशेष रूप से शुद्ध किया गया हो। जिसने अपने मन को वासनाओं, क्रोध, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष आदि से मुक्त कर लिया—उसका मन ही सबसे पवित्र तीर्थ बन जाता है। जहाँ मन शुद्ध है, वहीं भगवान का वास है; वहीं सच्चा पवित्र स्थान है। इस प्रकार श्लोक हमें मनोशुद्धि के महत्व की याद दिलाता है।
तीसरे प्रश्न में पूछा गया है कि संसार में क्या त्यागने योग्य है। शंकराचार्य कहते हैं—कान्चन और कान्ता, अर्थात् सोना और स्त्री—परंतु इसका सतही अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए। यहाँ ‘कान्चन’ लोभ, धनासक्ति और भौतिक लालसा का प्रतीक है, जबकि ‘कान्ता’ काम, वासना और इन्द्रियासक्ति का प्रतीक। वे यह नहीं कहते कि धन या गृहस्थ जीवन त्याग दिया जाए; वे कहते हैं कि उनके प्रति आसक्ति छोड़ दो। लोभ और कामना जहाँ होती है, वहाँ साधक का मन दास बन जाता है। इसलिए त्याज्य वास्तव में आसक्तियाँ हैं, न कि वस्तुएँ। जितना व्यक्ति वासनाओं और लोभ से मुक्त होता जाता है, उतना ही वह आत्मिक स्वतंत्रता की ओर बढ़ता है।
अंतिम प्रश्न है—सदा सुनने योग्य क्या है? इसका उत्तर शंकराचार्य देते हैं—गुरु और वेद का वचन। उनका अभिप्राय है कि जो व्यक्ति आत्मकल्याण चाहता है, वह हमेशा उन सत्प्रवचनों और अद्वैत सत्य की शिक्षाओं को श्रवण करे जो अज्ञान का नाश करती हैं। गुरु का वचन केवल शब्द नहीं होता, वह अनुभूति से उपजा सत्य होता है। वेद और उपनिषद संसार के सत्य स्वरूप, आत्मा और ब्रह्म की वास्तविकता को प्रकट करते हैं। इन्हें सुनते रहने से मन शुद्ध होता है, विवेक बढ़ता है और साधक के भीतर जागृति का दीप प्रज्वलित होता है।
इस प्रकार यह पूरा श्लोक साधना के चार आधारस्तंभों को प्रकट करता है—चरित्र की पवित्रता, मन की शुद्धि, आसक्तियों का त्याग और सत्संग तथा वेद-गुरुवाणी का श्रवण। जब साधक इन चारों को अपने जीवन में धारण कर लेता है, तभी वह वास्तव में आत्मोन्नति के मार्ग पर अग्रसर होता है।