विद्या हि का ब्रह्मगतिप्रदा या बोधो हि को यस्तु विमुक्तिहेतुः ।
को लाभ आत्मावगमो हि यो वै जितं जगत्केन मनो हि येन । ११ ।
प्रश्न:-वास्तव में विद्या कौन सी है ?
वास्तविक ज्ञान क्या है ?
यथार्थ लाभ क्या है?
जगत्को किसने जीता?
उत्तर:-जो परमात्मा को प्राप्त करा देने वाली है।
जो (यथार्थ) मुक्ति का कारण है।
जो परमात्मा की प्राप्ति है, वही।
व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा रचित यह सूक्ष्म प्रश्नोत्तरी आत्मविद्या, मुक्ति और आत्म-साक्षात्कार के परम मार्ग को अत्यंत सरल किन्तु गहन शब्दों में प्रकट करती है। यहाँ ‘विद्या’, ‘बोध’, ‘लाभ’ और ‘जगत्-विजय’ जैसे शब्द सामान्य अर्थों में नहीं, बल्कि अद्वैत वेदांत के परम दृष्टिकोण से प्रयुक्त हुए हैं। श्लोक कहता है—वास्तव में विद्या वही है जो ब्रह्म की ओर ले जाए, वास्तविक बोध वही है जो मुक्ति का कारण बने, श्रेष्ठ लाभ आत्मा की प्रत्यक्ष उपलब्धि है, और जिसने मन को जीत लिया है वही जगत् को भी जीत लेता है। इन चारों कथनों में संपूर्ण वेदांत का सार समाया हुआ है।
सामान्य रूप से विद्या का अर्थ होता है—पुस्तकीय ज्ञान, कलाएँ, शास्त्र, तर्क, या संसारिक कौशल। पर शंकराचार्य यहाँ बताते हैं कि इन सबका नाम विद्या नहीं। वास्तविक विद्या वह है जो जीव को उसके मूल सत्य, ब्रह्म के स्वरूप तक ले जाए। अर्थात् वह ज्ञान जो ‘मैं कौन हूँ?’—इस प्रश्न के उत्तर की ओर ले जाता है, वही विद्या है। उपनिषदों ने इसे ही परविद्या कहा है, जो अक्षर ब्रह्म का साक्षात् अनुभव कराती है। यह विद्या बाहरी सूचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि आत्म-जागरण है—जिससे जीव मिथ्या नाम-रूप की दुनिया का अज्ञान तजकर अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप को पहचान ले।
दूसरा प्रश्न है—वास्तविक बोध क्या है? शंकराचार्य स्पष्ट कहते हैं कि वह बोध जो विमुक्ति का कारण बन जाए, वही यथार्थ ज्ञान है। साधारण जानकारियाँ मन में भार बढ़ाती हैं, पर वह ज्ञान जो ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की प्रत्यक्ष अनुभूति कराए, वही मुक्ति का द्वार खोलता है। यह बोध केवल तर्क का फल नहीं, अपितु शास्त्र-श्रवण, मनन और ध्यान द्वारा प्राप्त होने वाला अंतःकरण का निर्मल प्रकाश है। जब यह बोध जागता है कि शरीर, मन, बुद्धि सब बदलने वाली घटनाएँ हैं, और इनसे भिन्न, इनका साक्षी, शाश्वत चैतन्य स्वरूप ही ‘मैं’ हूँ—तभी मोक्ष संभव है।
तीसरा प्रश्न पूछता है—सच्चा लाभ क्या है? संसार में लोग लाभ को धन, पद, वस्तु, नाम-यश और संबंधों से जोड़ते हैं। परंतु शंकराचार्य कहते हैं कि सर्वोच्च लाभ केवल एक ही है—आत्मा की अनुभूति। जो अपने भीतर में स्थित उस पूर्ण, निरपेक्ष, आनन्दस्वरूप आत्मा को पहचान लेता है, उसने वह पा लिया जो किसी भी सांसारिक उपलब्धि से श्रेष्ठ है। बाकी सारे लाभ क्षणिक हैं; आत्म-लाभ ही नित्य, अमर और अकम्प है।
अंतिम प्रश्न है—जगत् को कौन जीतता है? उत्तर अत्यंत गूढ़ है—जिसने अपने मन को जीत लिया, उसी ने जगत् को जीत लिया। क्योंकि मन ही जगत् का रचनाकार है। जब मन वासनाओं, इच्छाओं, द्वेष, भय और अपेक्षाओं से बँधा रहता है, तब दुनिया भारी और कठिन प्रतीत होती है। पर जो साधक मन को संयमित कर लेता है, जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है, जिसका ध्यान आत्मा में स्थिर है—उसके लिए यह जगत् मात्र दृश्य है, वह उसके पार स्थित हो जाता है। मन जीता—तो संसार जीता; मन हार गया—तो संसार असह्य लगता है।
इस प्रकार यह श्लोक साधक को स्मरण कराता है कि वास्तविक विद्या आत्मविद्या है, वास्तविक ज्ञान मुक्तिदायक बोध है, वास्तविक लाभ आत्म-अनुभूति है, और वास्तविक विजेता वही है जिसने अपने मन को वश में कर लिया है। यही सच्चे आध्यात्मिक जीवन की सबसे ऊँची उपलब्धि है।