को वा ज्वरः प्राणभृतां हि चिन्ता मूर्वोऽस्ति को यस्तु विवेकहीनः ।
कार्या प्रिया का शिवविष्णुभक्तिः किं जीवनं दोषविवर्जितं यत् । १०।
प्रश्न:-प्राणियों के लिये वास्तव में ज्वर क्या है ?
मूर्ख कौन है ?
करने योग्य प्यारी क्रिया क्या है ?
वास्तव में जीवन कौन-सा है ?
उत्तर:-चिन्ता ।
जो विचारहीन है।
शिव और विष्णु की भक्ति।
जो सर्वथा निर्दोष है।
व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा रचित यह प्रश्नोत्तरी अत्यंत सूक्ष्म, सरल तथा सारगर्भित उपदेशों का भंडार है। इसमें जीवन के गूढ़ सत्य को छोटी-छोटी पंक्तियों में अद्भुत स्पष्टता के साथ समझाया गया है। इस श्लोक में चार महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के माध्यम से मानव जीवन की मूल समस्याओं तथा उनके समाधान को उजागर किया गया है। प्रथम प्रश्न है—“प्राणियों के लिये वास्तविक ज्वर क्या है?” यहाँ ज्वर का अर्थ केवल शारीरिक बीमारी से नहीं है, बल्कि उस मानसिक ताप, उस आंतरिक अशांति से है जो मनुष्य को भीतर से व्याकुल कर देती है। शंकराचार्य कहते हैं कि वास्तविक ज्वर ‘चिन्ता’ है। चिंता मन को जला देती है, उसकी शांति को भंग कर देती है, और व्यक्ति की बुद्धि, स्वास्थ्य तथा निर्णय-शक्ति—तीनों को कमजोर करती है। शास्त्रों में कहा गया है कि चिंता चिता के समान है; जो व्यक्ति निरंतर चिंता में डूबा रहता है, वह भीतर ही भीतर ज्वलित रहता है। इस प्रकार, मानव जीवन में सबसे बड़ा ज्वर किसी रोग का ताप नहीं, बल्कि मन का अशांत हो जाना है।
दूसरा प्रश्न है—“मूर्ख कौन है?” शंकराचार्य का उत्तर अत्यंत सरल है—‘जो विवेकहीन है’, वही मूर्ख है। यहाँ मूर्खता का अर्थ पढ़े-लिखे न होने से नहीं है, बल्कि बुद्धि के सही उपयोग न होने से है। विवेक अर्थात् सही और गलत, शाश्वत और नश्वर, हित और अहित का भेद करने की क्षमता। जिस मनुष्य में यह शक्ति नहीं है, वही वास्तविक मूर्ख है। ऐसा व्यक्ति जीवन भर गलत मार्ग अपनाता है, क्षणिक सुखों में लिप्त रहता है, और अंत में गहन दुख पाता है। विवेक ही मनुष्य को पशु से अलग करता है और उसे धर्म, नीति एवं आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है। इसलिए शंकराचार्य का यह उत्तर मार्गदर्शन करता है कि जीवन में सबसे आवश्यक धन विवेक है।
तृतीय प्रश्न—“करने योग्य प्यारी क्रिया क्या है?”—का उत्तर है—“शिव और विष्णु की भक्ति।” इससे तात्पर्य केवल किसी विशेष देवता की उपासना नहीं है, बल्कि ईश्वर के प्रति प्रेम, श्रद्धा, समर्पण और शुद्ध हृदय से भक्ति करने से है। शंकराचार्य अद्वैतवादी थे और वे शिव तथा विष्णु को एक ही परमात्मा के दो रूप मानते थे। इसलिए भक्ति का अर्थ यहाँ ईश्वर के प्रति प्रेम, सत्य, पवित्रता और धर्म में आस्था से है। ऐसी भक्ति मन को निर्मल करती है, चिंता और अहंकार को मिटाती है, और आत्मा को परमात्मा के समीप ले जाती है। इसलिए यह सचमुच सबसे प्रिय और करने योग्य क्रिया कही गई है।
अंतिम प्रश्न है—“वास्तव में जीवन कौन-सा है?”—तो उत्तर है—“जो सर्वथा निर्दोष हो।” निर्दोष जीवन वह है जिसमें पाप, छल, कपट, हिंसा, ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ और अहंकार न हो। ऐसा जीवन ही सच्चा जीवन कहलाता है, क्योंकि वही मनुष्य को शांति, संतोष और आध्यात्मिक उन्नति देता है। दोषरहित जीवन ही धर्म का सार है और वही मोक्ष का मार्ग भी बनता है। शंकराचार्य यह संकेत देते हैं कि केवल सांस लेना ही जीवन नहीं है; वास्तविक जीवन वह है जिसमें मनुष्य अपने आचरण को शुद्ध और पवित्र बनाता है।
इस प्रकार, यह श्लोक मानव जीवन की चार मुख्य बीमारियों—चिंता, अविवेक, ईश्वर-विमुखता और दोषपूर्ण आचरण—का निदान प्रस्तुत करता है, और साथ ही उनके उपचार भी बताता है—शांति, विवेक, भक्ति और सदाचार।