Total Blog Views

Translate

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

आदि शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी (मणिरलमाला) का 13वा श्लोक

विषाद्विषं किं विषयाः समस्ता दुःखी सदा को विषयानुरागी। धन्योऽस्तु को यस्तु परोपकारी कः पूजनीयः शिवतत्त्वनिष्ठः । १३ ।

प्रश्न:-विष से भी भारी विष कौन है ?
सदा दुःखी कौन है ?
और धन्य कौन है ?
पूजनीय कौन है ?

उत्तर:-सारे विषयभोग।
जो संसार के भोगों में आसक्त है।
जो परोपकारी है।
कल्याणरूप परमात्म-तत्त्व में स्थित महात्मा।

व्याख्या:-विष से भी भारी विष वे विषय हैं जो मनुष्य को बार-बार अपनी ओर आकर्षित करके उसके विवेक को नष्ट कर देते हैं। सामान्य विष केवल शरीर को क्षति पहुँचाता है और एक बार में प्रभाव समाप्त भी हो सकता है, परन्तु विषय-वासनाएँ मन को निरन्तर बाँधती रहती हैं। इन भोगों में डूबा हुआ मनुष्य बार-बार जन्म-मरण के चक्र में फँसता है, इसलिए शंकराचार्य कहते हैं कि विषय ही वास्तव में महाविष हैं। वे दिखने में मधुर प्रतीत होते हैं, परन्तु उनके परिणाम कड़वे होते हैं। विषय-सुख क्षणिक है, पर उसका दुष्परिणाम चिरकाल तक मन को अशान्त रखता है। मन जितना इनके पीछे भागता है, उतना ही वह अपने वास्तविक स्वरूप से दूर हो जाता है। इस प्रकार यह विष मनुष्य की आध्यात्मिक यात्रा को बाधित करता हुआ मोक्ष के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध बन जाता है।

जो विषयों में अनुरक्त है, वही वास्तव में सदा दुःखी है। विषय-भोगों से कभी भी तृप्ति प्राप्त नहीं होती, क्योंकि इन्द्रियों की तृष्णा का कोई अन्त नहीं। शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि जिसका मन संसारिक वस्तुओं पर टिक गया है, वह व्यक्ति निरन्तर भय, चिंता, अपेक्षा और असन्तोष में जीता है। जब तक विषयों में सुख खोजने की प्रवृत्ति रहती है, तब तक व्यक्ति स्थायी सुख का स्पर्श भी नहीं कर सकता। यह दुःख केवल बाह्य परिस्थितियों का नहीं, बल्कि भीतर की उस बेचैनी का है जो निरन्तर नये-नये भोगों के लिए मन को बेचैन करती रहती है। इसलिए विषयानुरागी कभी भी वास्तविक आनन्द का अनुभव नहीं कर सकता।

इसके विपरीत, धन्य वही है जो परोपकारी है। परोपकार में वह शुद्धता, निःस्वार्थता और विस्तार है जो मनुष्य को भीतर से दिव्य बनाता है। ऐसा व्यक्ति केवल अपने लिए नहीं जीता, बल्कि अपने कर्मों से सम्पूर्ण समाज को लाभान्वित करता है। दूसरों के दुःख को कम करने में जो आनन्द है, वह किसी इन्द्रिय-सुख में नहीं। परोपकार मन को पवित्र करता है, अहंकार को हटाता है और व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति के योग्य बनाता है। इसीलिए शंकराचार्य कहते हैं कि धन्यता उसी में है जो दूसरों का कल्याण करने का संकल्प लेकर चलता है। परोपकार मनुष्य को भगवान के निकट ले जाता है, क्योंकि ईश्वर स्वयं निःस्वार्थ दया और प्रेम का स्वरूप है।

सबसे पूजनीय वही है जो शिवतत्त्व में स्थित है—अर्थात् जो कल्याणस्वरूप, शुद्ध-निर्मल, निरहंकार परमात्मा-तत्त्व में दृढ़ होकर स्थित है। ऐसा महात्मा संसार के सभी द्वन्द्वों से ऊपर उठ चुका होता है। उसके लिए न मान-अपमान का कोई महत्व है, न हानि-लाभ का। उसका जीवन करुणा, पवित्रता और सत्य से ओत-प्रोत होता है। वह अपने आचरण से ही उपदेश देता है और जिसका सम्पर्क मात्र मन को शान्ति प्रदान करता है। ऐसे व्यक्ति की पूजा केवल बाह्य रूप से नहीं, बल्कि हृदय से की जाती है, क्योंकि उसमें दिव्यता का प्रकट अनुभव होता है। शिवतत्त्वनिष्ठ व्यक्ति मानव रूप में देवता के समान होता है, जो दूसरों को भी सत्य के मार्ग पर ले जाने की प्रेरणा देता है।

इस प्रकार शंकराचार्य इन सरल प्रश्नोत्तर श्लोकों के माध्यम से मानव जीवन के गूढ़ सत्य स्पष्ट करते हैं—विषय महाविष हैं, विषयानुरागी सदा दुःखी है; परोपकारी ही वास्तव में धन्य है और शिवतत्त्व में स्थित महात्मा ही जीवन में पूजनीय।