शूरान्महाशूरतमोऽस्ति को वा मनोजबाणैर्व्यथितो न यस्तु ।
प्राज्ञोऽथ धीरश्च समस्तु को वा प्राप्तो न मोहं ललनाकटाक्षैः । १२ ।
प्रश्न:-वीरों में सब से बड़ा वीर कौन है ?
बुद्धिमान्, समदर्शी और धीर पुरुष कौन है ?
उत्तर:-जो कामबाणों से पीड़ित नहीं होता।
जो स्त्रियों के कटाक्षों से मोह को प्राप्त न हो।
व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा रचित यह प्रश्नोत्तरी मानव-स्वभाव, साधना और आत्मविकास का अत्यंत सूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत करती है। यहाँ वे वीरता, धैर्य, प्रज्ञा और समत्व जैसे गुणों की वास्तविक परिभाषा देते हैं, जो बाहरी आडंबरों से नहीं, बल्कि आतंरिक शक्ति और संयम से निर्मित होते हैं। श्लोक के अनुसार—“वीरों में महावीर कौन है?” इसका उत्तर है: वह जो कामबाणों से व्यथित नहीं होता। सामान्यतः वीरता को बाहरी शौर्य, युद्धकौशल या शरीरबल से जोड़ा जाता है, परंतु शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक वीर वही है जो मनोविकारों, इंद्रिय-प्रेरित आकर्षणों और कामनाओं के सूक्ष्म हमलों का सामना कर सके। कामना का बाण शरीर को नहीं, मन को भेदता है, और जिस व्यक्ति का मन ही विचलित हो जाए, उसके लिए बाहरी युद्ध में विजय भी तुच्छ हो जाती है। अतः वह साधक, जो काम के उच्छृंखल आवेगों को संयम और विवेक से नियंत्रित कर लेता है, वही महावीर कहलाता है। यह आंतरिक विजय बाहरी युद्धों से अनंत गुना कठिन है, क्योंकि यहाँ विरोधी अदृश्य है—स्वयं मन और उसकी वासनाएँ।
दूसरे प्रश्न में पूछा गया है—“बुद्धिमान, धीर और समदर्शी पुरुष कौन है?” इसका उत्तर है: वह जो स्त्रियों के कटाक्षों से उत्पन्न मोह में न फँसे। यहाँ “स्त्री-कटाक्ष” का अर्थ किसी विशेष लिंग के प्रति आकर्षण नहीं, बल्कि किसी भी प्रकार की संसारिक लालसा, आसक्ति और सुख-आकर्षण से है, जो मन को बांध लेते हैं। कटाक्ष प्रतीक है उन मोहक परिस्थितियों का, जो मनुष्य को विवेक से हटाकर भोग की दिशा में खींच ले जाती हैं। अतः जो व्यक्ति इन आकर्षणों में उलझकर अपना संतुलन नहीं खोता, वही धीर, प्राज्ञ और समदर्शी है।
यहाँ शंकराचार्य संसार-त्याग की नहीं, बल्कि मन-निग्रह और दृष्टि-शुद्धि की शिक्षा देते हैं। धैर्य का अर्थ केवल दुःख सहना नहीं; धैर्य का वास्तविक अर्थ है कि सुख और मोह के आकर्षण में भी मन न हिले। साधारणतया मनुष्य दुःख में टूटता है, पर उससे अधिक वह सुख और भोग की ओर आकृष्ट होकर अपनी स्थिरता खो देता है। जो व्यक्ति सुख और दुःख दोनों में समान बना रहता है, वही समदर्शी कहलाता है—ऐसा पुरुष किसी के कटाक्ष से मोहित नहीं होता, किसी के तिरस्कार से विचलित नहीं होता, और किसी भी परिस्थिति में अपने विवेक का परित्याग नहीं करता।
कामना और मोह दोनों साधक के मार्ग में दो महाशत्रु हैं। कामना मन को बहिर्मुख बनाती है, और मोह विवेक को ढँक देता है। जहाँ कामना है, वहाँ अशांति है; जहाँ मोह है, वहाँ निर्णय-भ्रंश है। इसलिए इन दोनों को जीतना ही आध्यात्मिक जीवन की सबसे बड़ी वीरता और सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमत्ता है। ऐसी अवस्था में पहुँचा हुआ व्यक्ति बाहरी रूप से साधारण दिखाई दे सकता है, परंतु भीतर उसकी शक्ति पर्वत से भी अडिग होती है। यही अंदरूनी स्थिरता उसे धीर बनाती है, विवेक उसे प्राज्ञ बनाता है, और आकर्षणों से मुक्त रहना उसे समदर्शी बनाता है।
अतः शंकराचार्य बताते हैं कि श्रेष्ठ वीरता आंतरिक विजय है, और श्रेष्ठ बुद्धिमत्ता बाहरी आकर्षणों में न फँसकर आत्मनिष्ठ रहना है। यही गुण साधक को मोक्ष की ओर ले जाते हैं।