सर्वास्ववस्थास्वपि किन्न कार्यं किं वा विधेयं विदुषा प्रयत्नात्।
स्नेहं च पापं पठनं च धर्म संसारमूलं हि किमस्ति चिन्ता । १४।
प्रश्न:-सभी अवस्थाओं में विद्वानों को बड़े जतन से क्या नहीं करना चाहिये और क्या करना चाहिये ?
संसार की जड़ क्या है ?
उत्तर:-संसार से स्नेह और पाप नहीं करना तथा सद्ग्रन्थों का पठन और धर्म का पालन करना चाहिये।
(उसका) चिन्तन ही।
व्याख्या:-आदि शंकराचार्यजी द्वारा रचित यह प्रश्नोत्तरी रूपी श्लोक साधक को जीवन के हर क्षण में सावधानी, विवेक और साधना-मार्ग पर स्थिर रहने का संकेत देता है। श्लोक का सार यह है कि विद्वान, साधक या कोई भी आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर व्यक्ति चाहे किसी भी अवस्था में हो—सुख में, दुख में, उत्थान में या पतन में—कुछ बातों से स्वयं को अवश्य बचाए और कुछ बातों को जीवन में सुदृढ़ता से अपनाए। यही विवेक आगे चलकर मुक्ति का कारण बनता है।
शंकराचार्यजी कहते हैं कि “सर्वास्ववस्थास्वपि किन्न कार्यं किं वा विधेयं विदुषा प्रयत्नात्”, अर्थात् एक ज्ञानी व्यक्ति को सभी परिस्थितियों में अत्यंत सावधानी के साथ यह ध्यान रखना चाहिए कि वह स्नेह और पाप से बचा रहे। यहाँ स्नेह का अर्थ सांसारिक आसक्ति से है, न कि प्रेम से। विषयों में, संबंधों में, वस्तुओं में, पद-मर्यादा में या शरीर में अत्यधिक लगाव ही स्नेह कहलाता है, जो बंधन का कारण बनता है। यह स्नेह मनुष्य को कर्म, मोह, भय और अहंकार में जकड़ देता है। विद्वान को चाहिए कि वह बड़े प्रयत्न से इस आसक्ति से स्वयं को बचाए और कर्म, वाणी तथा विचार से पाप के किसी भी रूप का सेवन न करे। पाप केवल हिंसा, झूठ या चोरी जैसी प्रत्यक्ष गलतियों तक सीमित नहीं है; बल्कि वह हर वह कर्म है जो हमें हमारे उच्चतम स्वरूप से दूर ले जाए, मन को मलिन करे और दूसरों को कष्ट पहुँचाए। एक जाग्रत साधक का जीवन पवित्रता और संयम का उदाहरण होना चाहिए।
दूसरी ओर, शंकराचार्यजी कहते हैं कि विद्वान को सदैव सद्ग्रन्थों का पठन और धर्म का पालन अवश्य करना चाहिए। पठन से यहाँ आशय मात्र पढ़ने से नहीं, बल्कि आचरण में उतारने से है। शास्त्रों, उपनिषदों, गीता, वेदान्त-ग्रन्थों या संत-वाणी का अध्ययन मन को शुद्ध करता है, दृष्टि को व्यापक बनाता है और जीवन को सही दिशा देता है। नियमित पठन से विवेक जागृत होता है—कौन-सा कर्म करना है, कौन-सा त्यागना है, कब मौन रखना है, कब बोलना है—इन सबकी स्पष्टता जन्म लेती है। धर्म का पालन अर्थात सत्य, अहिंसा, पवित्रता, संयम, सेवा, कर्तव्यपरायणता और ईश्वर-स्मरण—ये जीवन के वे स्तंभ हैं जो साधक को संसार-सागर में डूबने नहीं देते।
अंत में शंकराचार्यजी कहते हैं कि “संसारमूलं हि किमस्ति—चिन्ता”, यानी संसार का मूल चिन्ता है। यह चिन्ता केवल समस्याओं की चिंता नहीं है; बल्कि भविष्य की आकांक्षा, सुरक्षा का भय, नाम-यश की चिंता, परिवार और संपत्ति की चिंता, शरीर की चिंता—ये सारी चिंताएँ मन को अशांत कर देती हैं। यही चिंता जन्म-मरण के चक्र को मजबूत करती है और मनुष्य को निरंतर अस्थिर रखती है। जहाँ चिंता है, वहाँ समर्पण नहीं; जहाँ समर्पण नहीं, वहाँ शांति नहीं। वास्तव में चिंता अहंकार की अभिव्यक्ति है—“सब कुछ मैं ही संभालूँगा”—और यह मनुष्य को ईश्वर के प्रति विश्वास और निश्चिंतता से दूर ले जाती है।
इस प्रकार यह श्लोक एक साधना-सूत्र है—आसक्ति और पाप से दूर रहना, सद्ग्रंथों का अध्ययन करना, धर्म का पालन करना और चिंता का परित्याग करना। जो यह कर लेता है, उसके जीवन में शांति, विवेक और आत्मबोध स्वतः प्रकट होने लगते हैं, और वही सच्चे अर्थों में मुक्ति का पथ है।