वासो न सङ्गः सह कैर्विधेयो मूखैश्च नीचैश्च खलैश्च पापैः ।
मुमुक्षुणा किं त्वरितं विधेयं सत्सङ्गतिर्निर्ममतेशभक्तिः ।१७।
प्रश्न:-किन-किन के साथ निवास और संग नहीं करना चाहिये ?
मुक्ति चाहने वालों को तुरंत क्या करना चाहिये ?
उत्तर:-मूर्ख, नीच, दुष्ट और पापियों के साथ।
सत्संग, ममता का त्याग और परमेश्वर की भक्ति।
व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा रचित प्रश्नोत्तरी का यह श्लोक साधक को अत्यन्त महत्वपूर्ण सामाजिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि आध्यात्मिक प्रगति चाहने वाले व्यक्ति को किस प्रकार के लोगों के साथ रहने और संगति करने से बचना चाहिए, और उसके स्थान पर कौन-से गुणों एवं साधनों को तुरंत अपनाना चाहिए। श्लोक में कहा गया है— “वासो न संगः सह कैर्विधेयो मूखैश्च नीचैश्च खलैश्च पापैः”— अर्थात मूर्ख, निकृष्ट प्रवृत्ति वाले, दुष्ट स्वभाव वाले और पापी व्यक्तियों के साथ न तो निवास करना चाहिए और न ही उनकी संगति करनी चाहिए। यह निर्देश केवल सामाजिक शिष्टाचार का नियम नहीं है; यह मन की पवित्रता और साधना की रक्षा का उपाय है। मनुष्य का मन अत्यन्त ग्रहणशील होता है—संगति से ही विचारों का निर्माण होता है, और विचार ही आगे चलकर संस्कार, प्रवृत्तियाँ और चरित्र बनाते हैं। जिस प्रकार दूषित जल में रखा स्वच्छ वस्त्र भी गन्दा हो जाता है, उसी तरह दुष्ट संगति साधक के मन में शंका, आलस्य, अहंकार, क्रोध, मत्सर, विषयासक्ति और अविवेक का संचार कर देती है।
शंकराचार्य ‘मूर्ख’ का तात्पर्य उस व्यक्ति से करते हैं जिसका विवेक जागृत नहीं है, जो शुभ-अशुभ, उचित-अनुचित का विचार नहीं कर सकता। ‘नीच’ वह है जिसके जीवन का लक्ष्य केवल स्वार्थ, भोग और तुच्छ वासनाएँ हैं। ‘खल’ अर्थात वह व्यक्ति जो दूसरों को हानि पहुँचाकर सुख पाता है, जिसमें छल, द्वेष और कपट भरा है। ‘पापी’ वह है जो धर्ममार्ग से भटका हुआ है, जिसे किसी प्रकार की नैतिकता या आध्यात्मिकता का बोध नहीं है। इन सभी की संगति से मनुष्य का मन उसी दिशा में मुड़ता है, क्योंकि संगति का प्रभाव अटल है— “संगात् संजायते कामः”— जैसा संग, वैसा रंग।
इसके बाद श्लोक का दूसरा भाग— “मुमुक्षुणा किं त्वरितं विधेयं सत्सङ्गतिर्निर्ममतेश्च भक्तिः।” — साधक को तुरंत किए जाने वाले तीन महान साधनों की ओर निर्देश करता है। पहली आवश्यकता है सत्संग। सद्गुरुओं, संतपुरुषों, धर्मनिष्ठ और सत्यनिष्ठ व्यक्तियों का संग मन को शुद्ध करता है, ज्ञान का द्वार खोलता है और विवेक को जागृत करता है। सत्संग वह पवित्र वातावरण है जहाँ आत्मा अपनी दिव्य प्रकृति को सहजता से पहचानने लगती है।
दूसरा साधन है निर्ममता, अर्थात ममता और ‘मेरा-तेरा’ के अहंकार का त्याग। ममता ही बन्धन का मूल है— देह, धन, संबंध, पद, मान, विचार, यहाँ तक कि अपनी साधना तक से ‘मेरा’ का भाव रखने से व्यक्ति मुक्त नहीं हो सकता। जब तक ममता बनी रहती है, मन संसार की ओर आकृष्ट रहता है; जब ममता घटती है, तब हृदय स्वतः ही परमात्मा की ओर मुड़ने लगता है।
तीसरा साधन है ईश्वर-भक्ति। यहाँ भक्ति का अर्थ केवल भावुकता नहीं है, बल्कि समर्पण, श्रद्धा और निरंतर स्मरण है। भक्ति मन को एकाग्र करती है, अहंकार को पिघलाती है और साधक को अंतर्मन में स्थित परम सत्ता से जोड़ती है। विवेक, वैराग्य, शान्ति और समत्व— ये सब भक्ति के फल हैं।
इस प्रकार इस श्लोक का सार यह है कि आत्मकल्याण के इच्छुक व्यक्ति को पहले अपने वातावरण और संगति को शुद्ध करना चाहिए, क्योंकि साधना की वृद्धि सद्विचार और सद्भावना के वातावरण में ही सम्भव है। दुष्ट संगति से दूर रहकर सत्संग, निर्ममता और ईश्वर-भक्ति को अपनाने वाला साधक शीघ्र ही आध्यात्मिक पथ पर उन्नति प्राप्त करता है और अंततः आत्मज्ञान की दिशा में अग्रसर होता है।