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सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

आदि शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी (मणिरलमाला) का 16वा श्लोक

ज्ञातुं न शक्यं च किमस्ति सर्वै-र्योषिन्मनो यच्चरितं तदीयम् । 

का दुस्त्यजा सर्वजनैर्दुराशा विद्याविहीनः पशुरस्ति को वा । १६ ।

प्रश्न:-सब किसी के लिये क्या जानना सम्भव नहीं है ?
सब लोगों के लिये क्या | त्यागना अत्यन्त कठिन है?
पशु कौन है ?

उत्तर:-स्त्री का मन और उसका चरित्र।
बुरी वासना (विषयभोग और पाप की इच्छाएँ) ।
जो सद्विद्या से रहित (मूर्ख) है।

व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा प्रस्तुत यह प्रश्नोत्तरी श्लोक मानवीय प्रकृति, नैतिकता और आध्यात्मिक दृष्टि के अत्यंत सूक्ष्म पक्षों को उद्घाटित करता है। इस श्लोक में तीन महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए हैं—क्या ऐसी चीज है जिसे कोई पूर्णतः जान नहीं सकता; क्या ऐसी प्रवृत्ति है जिसे आम मनुष्यों के लिए छोड़ना अत्यन्त कठिन है; और कौन वास्तव में ‘पशु’ कहलाने योग्य है। इन प्रश्नों के उत्तर केवल सामाजिक व्यवहार या सामान्य नैतिकता का वर्णन नहीं करते, बल्कि मनुष्य की आन्तरिक प्रवृत्तियों को समझने का अवसर देते हैं।

पहला कथन—“स्त्री का मन और उसका चरित्र कोई नहीं जान सकता”—यह किसी विशेष स्त्री या स्त्री जाति के लिए नहीं, बल्कि मनुष्य की प्रकृति के उस रहस्यमय पक्ष को इंगित करता है जो किसी भी व्यक्ति—स्त्री हो या पुरुष—के भीतर विद्यमान होता है। मन का स्वभाव ही चंचल, गूढ़ और अप्रत्याशित है, और चरित्र का वास्तविक रूप भी बाहरी दृष्टि से पूर्णतः समझ पाना संभव नहीं होता। शंकराचार्य यहाँ मनोविज्ञान की उस सार्वभौमिक सत्यता की ओर संकेत करते हैं कि मनुष्य के आन्तरिक संसार को कोई बाहर वाला सम्पूर्णता से नहीं जान सकता। यह कथन मन के रहस्य पर प्रकाश डालता है और यह समझने के लिए प्रेरित करता है कि बाहरी आकलन से किसी के बारे में पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं होता।

दूसरा प्रश्न—सब लोगों के लिए क्या त्यागना अत्यन्त कठिन है? उत्तर दिया गया—“दुराशा”, अर्थात् अनियंत्रित इच्छाएँ, वासनाएँ, विषयासक्ति और पापकर्मों की इच्छाएँ। मनुष्य का मन लगातार नई-नई आकांक्षाएँ पैदा करता है, और ये इच्छाएँ ही उसके दुःख, बँधन और अशान्ति का मूल कारण बनती हैं। दुराशा केवल भोगों की इच्छा नहीं, बल्कि वह अंधी तृष्णा है जो व्यक्ति को संतोष और विवेक से दूर ले जाती है। शंकराचार्य यह समझा रहे हैं कि जब तक मनुष्य अपनी इच्छाओं को नियंत्रित नहीं करता, तब तक वह धर्म, शांति और आत्मिक प्रगति की राह पर स्थिर नहीं हो सकता। वास्तव में यह दुराशा ही संसार-चक्र को चलाती है और यही बन्धन का सबसे बड़ा कारण है।

तीसरा कथन—“पशु कौन है?”—उत्तर दिया गया—“जो सद्विद्या से रहित है।” यह अत्यंत गहन उत्तर है। यहाँ शंकराचार्य यह नहीं कहते कि जो पढ़ा-लिखा नहीं है वह पशु है, बल्कि वह व्यक्ति पशुवत् है जो विवेक, सद्बुद्धि, नैतिकता और आत्मज्ञान से रहित है। मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसकी बाहरी शिक्षा में नहीं, बल्कि आन्तरिक समझ और जागरूकता में निहित है। विद्या का अर्थ है वह ज्ञान जो व्यक्ति को ऊँचा उठाए, जो उसे आत्म-साक्षात्कार, धर्म, सत्य और आचरण के मार्ग पर चले। जिसके भीतर सद्विद्या नहीं, वह प्रवृत्तियों, वासनाओं और अज्ञान के वश में होकर जीवन बिताता है, और इस प्रकार पशु-चेतना में ही रहता है। अतः शंकराचार्य का संकेत है कि मनुष्य को मनुष्य बनाने वाली चीज सिर्फ शरीर नहीं, बल्कि ज्ञान और विवेक है।

इस प्रकार यह श्लोक मानव-स्वभाव, नैतिक अनुशासन और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत मूल्यवान सूत्र प्रदान करता है। यह हमें सिखाता है कि दूसरों के मन और चरित्र को जानने का दावा न करें; अपने भीतर की इच्छाओं को नियंत्रित करने का प्रयास करें; और जीवन में सद्विद्या, सत्य और विवेक को अपनाएँ—क्योंकि यही वास्तविक मानवता का आधार है।