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बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

आदि शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी (मणिरलमाला) का 18वा श्लोक

लघुत्वमूलं च किमर्थितैव गुरुत्वमूलं यदयाचनं च।

जातो हि को यस्य पुनर्न जन्म को वा मृतो यस्य पुनर्न मृत्युः । १८ ।

प्रश्न:-छोटेपन की जड़ क्या है ?
बड़प्पन की जड़ क्या है?
किसका जन्म सराहनीय है?
किसकी मृत्यु सराहनीय है?

उत्तर:-याचना ही।
कुछ भी न माँगना।
जिसका फिर जन्म न हो।
जिसकी फिर मृत्यु नहीं होती।

व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा प्रस्तुत यह श्लोक मानवीय चरित्र, आध्यात्मिक उन्नति और जीवन-मरण के वास्तविक अर्थ को अत्यंत संक्षेप और गहन रूप में प्रकट करता है। “लघुत्वमूलं च किमर्थितैव, गुरुत्वमूलं यदयाचनं च” — इस पंक्ति में आचार्य एक सूक्ष्म सत्य को बताते हैं कि मनुष्य का छोटापन किसी बाहरी रूप-रंग, धन-वैभव या सामाजिक स्थिति से नहीं मापा जाता; उसका वास्तविक लघुत्व याचनशीलता से प्रकट होता है। बार-बार माँगने की वृत्ति, दूसरों पर निर्भर होने की प्रवृत्ति और बाहरी वस्तुओं से सुरक्षा, सम्मान और सुख पाने का आग्रह — यही मनुष्य को आन्तरिक रूप से कमजोर और छोटा बनाते हैं। भौतिक रूप से सम्पन्न व्यक्ति भी यदि निरंतर याचना करता है—मान-प्रतिष्ठा, सहानुभूति, मान्यता, लाभ, समर्थन—तो वह भीतर से निर्धन ही माना जाता है। याचना मनुष्य की स्वतंत्रता को छीन लेती है और आत्मबल को कम कर देती है।

इसके विपरीत, बड़प्पन की जड़ “यदयाचनम्”—अर्थात् कुछ भी न माँगना। इसका अर्थ अभिमान या कठोरता नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और संतोष का भाव है। जो परम सत्य में स्थित होकर, अपने कर्तव्य का पालन करते हुए किसी से कुछ नहीं माँगता, वही वास्तव में उदात्त है। वह मनुष्य जीवन की परिस्थितियों को स्वीकार करता है, पराधीनता से मुक्त रहता है और संसार में रहते हुए भी उसकी आत्मा स्वतंत्र रहती है। ऐसा व्यक्ति भीतर से परिपूर्ण होता है, इसलिए उसे बाहरी सहारे की आवश्यकता नहीं रहती। यह गुण साधारण जीवन में भी देखा जा सकता है—जो व्यक्ति आत्मसम्मान बनाए रखता है, ईमानदारी से अपना मार्ग चलता है और दूसरों का सहयोग चाहे तो प्रेमपूर्वक स्वीकार करता है, परंतु याचना नहीं करता, वही महान कहा जाता है। शंकराचार्य यहाँ आत्मबल, संतोष और आध्यात्मिक धैर्य को “गुरुत्व” अर्थात् बड़प्पन का मूल बताते हैं।

श्लोक का दूसरा भाग जन्म और मृत्यु के आध्यात्मिक रहस्य को उजागर करता है—“जातो हि को यस्य पुनर्न जन्म”—सच्चा जन्म उसी का माना गया है जिसका फिर कभी जन्म न हो। इसका सीधा अर्थ है मोक्ष की प्राप्ति। जन्म-मरण का चक्र तब तक चलता है जब तक जीव अज्ञान, वासनाओं और कर्मों के बंधन में है। ज्ञान, वैराग्य और आत्मसाक्षात्कार से जब यह बंधन समाप्त हो जाता है, तब जीव पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है। अतः जिस जन्म का परिणाम पुनर्जन्म की समाप्ति है—वह जन्म धन्य है, क्योंकि वही जन्म जीव को ब्रह्मज्ञान के द्वार तक ले जाता है। इसे ही आध्यात्मिक जन्म कहा गया है, जिसे उपनिषदों में ‘विद्या-जन्म’ या ‘दिव्य-जन्म’ कहा गया है।

इसी प्रकार “को वा मृतो यस्य पुनर्न मृत्युः”—जिसकी कभी पुनः मृत्यु न हो, वही वास्तव में मरा हुआ कहलाता है। इसका तात्पर्य शरीर की मृत्यु से नहीं है, क्योंकि शरीर तो सभी का नश्वर है। यहाँ मृत्यु का अर्थ है—अविद्या, अहंकार और देहाभिमान का अंत। जब मनुष्य आत्मस्वरूप का साक्षात्कार कर लेता है, तब उसके लिए मृत्यु नामक कोई भय या सीमा नहीं रहती। वह जान लेता है कि “मैं शरीर नहीं, नश्वर नहीं, अपितु चैतन्य स्वरूप आत्मा हूँ”—तब मृत्यु उसके लिए समाप्त हो जाती है। इसलिए ऐसी मृत्यु ही श्रेष्ठ है जिसका परिणाम अमरत्व हो।

इस प्रकार यह श्लोक मानव जीवन का आधारभूत सत्य सिखाता है—याचना से लघुत्व, संतोष से महानता, ज्ञान से सच्चा जन्म और आत्मबोध से मृत्यु का अंत। यह संक्षेप में पूरे वेदांत का सार प्रस्तुत करता है और साधक को जीवन की दिशा स्पष्ट करता है।