मूकोऽस्ति को वा बधिरश्च को वा वक्तुं न युक्तं समये समर्थः ।
तथ्यं सुपथ्यं न शृणोति वाक्यं विश्वासपात्रं न किमस्ति नारी। १९ ।
प्रश्न:-गूँगा कौन है ?
और बहिरा कौन है ?
विश्वासके योग्य कौन नहीं है ?
उत्तर:-जो समय पर उचित वचन कहने में समर्थ नहीं है।
जो यथार्थ और हित कर वचन नहीं सुनता।
नारी।
व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा रचित प्रश्नोत्तरी के इस उन्नीसवें श्लोक में मानवीय गुण-दोषों को अत्यंत सरल, किन्तु तीक्ष्ण उपमाओं के माध्यम से समझाया गया है। यहाँ “मूक”, “बधिर” और “अविश्वसनीय” जैसे शब्द मात्र शारीरिक दुर्बलता के अर्थ में नहीं हैं, बल्कि मनोवैचारिक और चरित्रगत दुर्बलताओं को इंगित करते हैं। शंकराचार्य का उद्देश्य किसी वर्ग विशेष की निन्दा नहीं, बल्कि मनुष्य को उसके आचरण पर विचार करने के लिए प्रेरित करना है, ताकि साधक आत्मोन्नति की दिशा में आगे बढ़ सके।
पहला प्रश्न—गूँगा कौन है? श्लोक कहता है कि जो समय पर उचित वचन कहने में समर्थ नहीं है, वही वास्तव में मूक है। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य का मौन या वाणी, दोनों तभी सार्थक हैं जब उनका प्रयोग उचित समय पर उचित ढंग से किया जाए। ऐसे लोग जो किसी को मार्गदर्शन देने की क्षमता रखते हुए भी आवश्यकता पड़ने पर मौन रह जाते हैं, या सत्य और धर्म की रक्षा के अवसर पर चुप्पी साध लेते हैं, उनकी यह चुप्पी वास्तविक गूँगेपन के समान ही है। समाज में अनेक बार अन्याय, अधर्म या कुरीतियाँ केवल इसलिए बढ़ जाती हैं क्योंकि समझदार लोग बोलने से कतराते हैं। शंकराचार्य ऐसे मौन को दोष रूप में पहचानने का संदेश देते हैं, ताकि साधक में नैतिक साहस विकसित हो और वह सही समय पर सही वचन बोलने का सामर्थ्य जुटाए।
दूसरा प्रश्न—बहिरा कौन है? यहाँ कहा गया है कि जो यथार्थ और हितकर वचन नहीं सुनता, वही बहिरा है। मनुष्य के भीतर यदि विनम्रता नहीं है, यदि वह सत्य को सुनने के लिए तैयार नहीं, यदि वह उपदेश, सद्वचन या गुरु-वचनों की अवहेलना करता है, तो उसका यह व्यवहार उसे मानसिक रूप से “बहरा” बना देता है। ऐसे लोग बाहरी ध्वनियाँ तो सुन लेते हैं, परंतु कल्याणकारी वचनों को ग्रहण करने की क्षमता खो देते हैं। आध्यात्मिक परंपरा में ‘श्रवण’ को सबसे पहला साधन माना गया है—क्योंकि सुनने की कला ही ज्ञान को हृदय में प्रवेश कराती है। जो सुनने की योग्यता ही खो देता है, उसके लिए आगे कोई साधना सफल होना कठिन हो जाता है।
तीसरा प्रश्न—विश्वास के योग्य कौन नहीं है? श्लोक में उत्तर आता है—“नारी।” यहाँ ‘नारी’ शब्द का अर्थ सामान्य स्त्री नहीं है। शंकराचार्य काव्य और दार्शनिक परंपरा की उस विशिष्ट शैली का उपयोग कर रहे हैं जिसमें ‘नारी’ का अर्थ ‘माया’, ‘इन्द्रिय-लालसा’, ‘विषय-भोग’, या अस्थिर मन की प्रवृत्तियों से होता है। अनेक शास्त्रों में ‘नारी’ शब्द का रूपक रूप में प्रयोग किया गया है, जिससे आशय है—ऐसी वस्तु या प्रवृत्ति जो चित्त को आकर्षित करती है, भ्रमित करती है और साधक को पथभ्रष्ट कर सकती है। इसलिए विश्वास योग्य न होने का वास्तविक अर्थ यह है कि साधक को विषयों, इच्छाओं और माया की चंचलता पर भरोसा नहीं करना चाहिए। जो वस्तुएँ निरंतर बदलती रहती हैं, वे स्थायी सुख नहीं दे सकतीं; उन पर आश्रित होने वाला मन दुख और मोह में फँस जाता है। शंकराचार्य का संकेत है कि साधक को विवेक से पहचानना चाहिए कि किस पर भरोसा किया जाए और किससे सावधान रहना चाहिए।
इस प्रकार यह श्लोक साधक को तीन प्रमुख संदेश देता है—सत्य और धर्म के लिए साहसपूर्वक बोलना, हितकारी वचनों को विनम्रता से सुनना, और मायिक, अस्थिर तथा मोहकारी प्रवृत्तियों पर विश्वास न करना। ये तीनों उपदेश साधना-मार्ग के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, क्योंकि इन्हीं से विवेक, संयम और आत्मशुद्धि का विकास होता है।