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शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

आदि शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी (मणिरलमाला) का 21वा श्लोक

शत्रोर्महाशत्रुतमोऽस्ति को वा कामः सकोपानृतलोभतृष्णः ।

न पूर्यते को विषयैः स एव किं दुःखमूलं ममताभिधानम् । २१।

प्रश्न:-शत्रुओं में सबसे बड़ा भारी शत्रु कौन है ?
विषय भोगों से कौन तृप्त नहीं होता ?
दुःख की जड़ क्या है?

उत्तर:-क्रोध, झूठ, लोभ और तृष्णा सहित काम।
वही काम।
ममता नामक दोष ।

व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा प्रस्तुत यह प्रश्नोत्तरी श्लोक अत्यन्त सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य को प्रकट करता है। श्लोक का पहला भाग पूछता है कि शत्रुओं में सबसे बड़ा शत्रु कौन है। सामान्यतः मनुष्य बाहरी व्यक्तियों या परिस्थितियों को अपना शत्रु मानता है, परन्तु शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक शत्रु कोई बाहरी शक्ति नहीं, बल्कि मन के भीतर बैठा हुआ काम है—जो क्रोध, असत्य, लोभ और तृष्णा के साथ मिलकर मनुष्य को बाँधता है। यहाँ ‘काम’ का अर्थ केवल कामेच्छा नहीं, बल्कि किसी भी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के प्रति तीव्र आकर्षण, अत्यधिक इच्छा और आग्रह है। यही काम जब अपनी पूर्ति में बाधा देखता है तो क्रोध उत्पन्न होता है। इच्छा की पूर्ति के लिए झूठ और छल का सहारा लिया जाता है, और जब इच्छा पूरी होने लगती है, तो लोभ और तृष्णा उसे और बढ़ाते चले जाते हैं। इस प्रकार काम एक अकेला दोष नहीं, बल्कि अनेक दोषों का मूल है; इसी कारण उसे ‘महाशत्रु से भी बड़ा शत्रु’ कहा गया है।

श्लोक का दूसरा प्रश्न पूछता है—विषय भोगों से कौन तृप्त नहीं होता? उत्तर मिलता है—वही काम। इच्छाओं का स्वभाव ही ऐसा है कि वे कभी पूर्ण नहीं होतीं। एक इच्छा पूरी हुई तो दूसरी खड़ी हो जाती है। मनुष्य जितना अधिक सुख-साधन प्राप्त करता है, उतनी ही नई इच्छाएँ जन्म लेती हैं। यह स्थिति उस अग्नि के समान है जिसमें जितना ईंधन डालो, वह उतनी ही अधिक प्रज्वलित होती है। संसार के विषय भोग, चाहे वे धन, प्रतिष्ठा, भोग-विलास या किसी भी प्रकार की बाहरी उपलब्धियाँ हों—इनसे मन कभी शान्त नहीं होता। इसलिए शंकराचार्य कहते हैं कि विषयों से असन्तुष्ट रहने वाला भी वही काम है, जो निरन्तर मनुष्य को तृप्ति की खोज में भटकाता रहता है।

तीसरा प्रश्न है—दुःख की जड़ क्या है? इसका उत्तर दिया गया है—ममता नामक दोष। ममता अर्थात ‘मेरा-मेरा’ का भाव। जब मनुष्य किसी वस्तु, व्यक्ति, सम्बन्ध या परिस्थिति को ‘यह मेरा है’ कहकर पकड़ लेता है, तभी दुःख का बीज बोया जाता है। ममता से आसक्ति जन्म लेती है; आसक्ति से भय आता है—कि कहीं मेरा प्रिय वस्तु या व्यक्ति मुझसे छूट न जाए; और जब छूटता है तो शोक उत्पन्न होता है। इच्छा, आसक्ति, भय और शोक—ये सभी दुःख के विविध रूप हैं, और इन सबका मूल कारण ममता ही है।

इस प्रकार शंकराचार्य इस पूरे श्लोक में मनुष्य के बंधन का गहरा विश्लेषण करते हैं। वे बताते हैं कि दुःख का कारण बाहरी संसार नहीं, बल्कि भीतर की मानसिक प्रवृत्तियाँ हैं। जब तक मनुष्य काम, लोभ, क्रोध, तृष्णा और झूठ जैसे दोषों को शत्रु न समझकर उन्हें पोषण देता रहेगा, तब तक वह शान्ति और आनन्द से वंचित रहेगा। विषय भोगों से तृप्ति की आशा व्यर्थ है, क्योंकि इच्छा की प्रकृति ही अतृप्त है। और इन सबके पीछे जो मूल कारण है, वह है ममता—स्वार्थपरक ‘मैं’ और ‘मेरा’ का आग्रह। इसलिए मुक्ति का प्रथम चरण है—काम का नियंत्रण, इच्छा की सीमा, और ममता का त्याग। यही शिक्षाएँ इसे केवल नैतिक नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक मार्गदर्शन बनाती हैं।