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शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

आदि शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी (मणिरलमाला) का 20वा श्लोक

तत्त्वं किमेकं शिवमद्वितीयं किमुत्तमं सच्चरितं यदस्ति ।
त्याज्यं सुखं किं स्त्रियमेव सम्यग् देयं परं किं त्वभयं सदैव । २०।

प्रश्न:-एक तत्त्व क्या है ?
सबसे उत्तम क्या है ?
कौन-सा सुख तज देना चाहिये ?
देने योग्य उत्तम दान क्या है ?

उत्तर:-अद्वितीय कल्याण-तत्त्व (परमात्मा)।
जो उत्तम आचरण है।
सब प्रकार से स्त्री का सुख ही।
सदा अभय ही।

व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा रचित यह प्रश्नोत्तरी अत्यंत गहन दार्शनिक दृष्टि प्रस्तुत करती है, जिसमें जीवन, धर्म, आचरण और मानव-मूल्यों पर स्पष्ट और मार्मिक उपदेश निहित है। इस श्लोक में चार मूलभूत प्रश्नों के माध्यम से आत्मज्ञान और आदर्श जीवन की दिशा को सहज भाषा में समझाया गया है। प्रथम प्रश्न है—“एक तत्त्व क्या है?” इसका उत्तर दिया गया है—“अद्वितीय कल्याण-तत्त्व, अर्थात् परमात्मा।” समस्त वेद, उपनिषद और अद्वैत वेदांत का सार यही है कि इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड का आधार एक ही सत्य तत्त्व है, जो द्वैत से रहित, कालातीत, निराकार और अनन्त है। मनुष्य जब बाह्य विविधताओं में उलझ जाता है, तब वह इस एकत्व के अनुभव से दूर हो जाता है; परंतु शंकराचार्य संकेत करते हैं कि साधक का लक्ष्य उसी अद्वितीय तत्त्व को पहचानना होना चाहिए, क्योंकि वही समस्त कल्याण का मूल है और वही जीवन का परम आश्रय है।

दूसरे प्रश्न में पूछा गया है—“सबसे उत्तम क्या है?” इसका उत्तर है—“उत्तम आचरण।” ज्ञान, विद्या, क्षमता, प्रतिष्ठा—all lose their value if one's conduct is impure. चरित्र ही मनुष्य का वास्तविक आभूषण है। उत्तम आचरण में सत्य, अहिंसा, करुणा, संयम, ईमानदारी और विनम्रता जैसे गुण समाए होते हैं। शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि जीवन में यदि किसी एक गुण को उत्कृष्टता का दर्जा दिया जा सकता है, तो वह है—सच्चरित्रता। यह न केवल आत्मिक उन्नति का आधार है, बल्कि समाज में सम्मान और विश्वास का मूल भी यही है।

तीसरा प्रश्न है—“कौन-सा सुख त्याग देना चाहिए?” उत्तर मिलता है—“स्त्री का सुख।” इसका आशय सांसारिक विषय-विकारों और इंद्रिय-भोगों से है, विशेषतः काम-विकार से उत्पन्न आसक्ति से। यहाँ “स्त्री” शब्द विशेष अर्थ में नहीं, बल्कि कामनाओं का प्रतीक है—माया की वह शक्ति जो मनुष्य को भटकाती है, उसके विवेक को ढँक देती है और उसे आध्यात्मिक पथ से हटाकर भोग-वृत्ति में उलझा देती है। साधक को इस प्रकार के काम-आकर्षण से बचकर मन और इंद्रियों को संयमित रखना चाहिए, क्योंकि यह मार्ग बंधन की ओर ले जाता है, न कि मुक्ति की ओर।

अंतिम प्रश्न है—“देने योग्य उत्तम दान क्या है?” यहाँ उत्तर आता है—“सदा अभय देना।” दान का सर्वोत्तम रूप केवल धन देना नहीं है, बल्कि भय दूर करना है—किसी को सुरक्षा, सहारा, सांत्वना और निडरता प्रदान करना। अभय-दान वह सत्कर्म है जिससे किसी प्राणी के हृदय में शांति, आश्वासन और विश्वास का संचार होता है। यह शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक—तीनों स्तरों पर किया जा सकता है। कोई कमजोर है, तो उसकी रक्षा; कोई भयभीत है, तो उसे भरोसा; कोई भ्रमित है, तो उसे सही मार्ग—ये सभी अभय-दान के रूप हैं। यह दान ऐसा है जिसे देने वाला भी पवित्र होता है और पाने वाला भी संतुष्ट होता है।

इस प्रकार यह श्लोक जीवन के चार स्तंभ प्रस्तुत करता है—सत्य-तत्त्व की पहचान, श्रेष्ठ आचरण, विषय-त्याग और अभय-दान। इन चारों को अपनाकर मनुष्य न केवल आत्मोन्नति की ओर अग्रसर होता है, बल्कि समाज भी उससे प्रकाशमान होता है।