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रविवार, 22 फ़रवरी 2026

आदि शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी (मणिरलमाला) का 22वा श्लोक

किं मण्डनं साक्षरता मुखस्य सत्यं च किं भूतहितं सदैव ।

किं कर्म कृत्वा न हि शोचनीयं कामारिकंसारिसमर्चनाख्यम् । २२ ।

प्रश्न:-मुख का भूषण क्या है ? |
सच्चा कर्म क्या है?
कौन-सा कर्म कर के पछताना नहीं पड़ता ?

उत्तर:-विद्वत्ता।
सदा ही प्राणियों का हित करना।
भगवान् शिव और श्रीकृष्ण का पूजनरूप कर्म।

व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा रचित प्रश्नोत्तरी का यह श्लोक जीवन की नैतिकता, आचरण और आध्यात्मिक दिशा को अत्यंत संक्षेप में परन्तु गहनता के साथ समझाता है। श्लोक का प्रथम भाग पूछता है—“मुख का भूषण क्या है?” सामान्यतः मनुष्य स्वयं को सुशोभित करने के लिए बाहरी आभूषणों या श्रृंगार पर ध्यान देता है, किन्तु शंकराचार्य कहते हैं कि वास्तविक सौन्दर्य बाहरी नहीं, बल्कि आन्तरिक होता है। मुख का वास्तविक भूषण साक्षरता या विद्वत्ता है—अर्थात् सारगर्भित, सत्य, मधुर और हितकारी वाणी। ऐसा ज्ञान, जो व्यक्ति की बुद्धि को प्रकाशित करे और उसके शब्दों में शालीनता, मर्यादा और विवेक भर दे—वही मुख का सच्चा अलंकार है। मनुष्य का चेहरा उसके शब्दों से ही दमकता है; वाणी की शुद्धता और ज्ञान की प्रखरता चेहरे को वह सौन्दर्य देती है जो किसी बाहरी आभूषण से नहीं मिल सकता।

श्लोक आगे पूछता है—“सत्यं च किं भूतहितं सदैव?” अर्थात् सच्चा कर्म क्या है? शंकराचार्य उत्तर देते हैं—भूतहितम्, यानी सदा ही प्राणियों का हित करना। धर्म की सार्थकता तभी है जब वह समग्रता में किसी जीव के कल्याण से जुड़ा हो। मनुष्य के कर्म तभी सत्य कहलाते हैं जब उनमें निःस्वार्थ भाव, करुणा, सहायता, उदारता और परहित की भावना हो। किसी के दुःख को कम करना, किसी को भय से मुक्त करना, किसी भूखे को भोजन देना, किसी दुखित हृदय को सांत्वना देना—ये सब कर्म भूतहित की श्रेणी में आते हैं। यह उपदेश मनुष्य को केवल आध्यात्मिक ही नहीं, सामाजिक रूप से भी श्रेष्ठ बनाता है। संसार में वही व्यक्ति वास्तव में पुण्यवान है जिसका जीवन दूसरों के लिए उपयोगी हो और जिसका आचरण किसी न किसी रूप में समाज की भलाई को प्रेरित करे।

श्लोक का अन्तिम प्रश्न है—“किं कर्म कृत्वा न हि शोचनीयं?” अर्थात् कौन-सा कर्म ऐसा है जिसे करके मनुष्य को कभी पछताना नहीं पड़ता। शंकराचार्य इसका उत्तर देते हैं—कामारिकं सारिसमर्चना ख्यम्, अर्थात् भगवान् शिव और श्रीकृष्ण जैसे देवों की उपासना, भक्ति और आराधना। ऐसे कर्म शाश्वत हैं, क्योंकि वे आत्मा को पवित्र करते हैं, मन को स्थिर करते हैं और जीवन को सही दिशा देते हैं। देवों की पूजा केवल बाहरी कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि समर्पण, श्रद्धा, विनम्रता, आभार और अनासक्ति का अभ्यास है। यह मनुष्य को भीतर से सुशोधित करता है, अहंकार को क्षीण करता है और उसे धर्म, सत्य, और कर्तव्य के पथ पर स्थिर रखता है। ऐसे आध्यात्मिक कर्म कभी दुःख या पश्चाताप का कारण नहीं बनते, क्योंकि वे व्यक्ति को उच्चतर चेतना की ओर ले जाते हैं।

इस प्रकार इस श्लोक में शंकराचार्य अत्यंत सरल भाषा में जीवन की तीन मुख्य दिशाएँ बताते हैं—ज्ञान से मनुष्य का वाणी-सौंदर्य बढ़ता है, परहित से कर्म पवित्र होते हैं और ईश्वर-पूजन से जीवन सार्थक बनता है। इन तीनों का समन्वय मनुष्य को न केवल आचरण में श्रेष्ठ बनाता है बल्कि उसे आध्यात्मिक विकास की ओर भी अग्रसर करता है।