बुद्ध्वा न बोध्यं परिशिष्यते किं शिवप्रसादं सुखबोधरूपम् ।
ज्ञाते तु कस्मिन्विदितं जगत्स्या-त्सर्वात्मके ब्रह्मणि पूर्णरूपे । २७ ।
प्रश्न:-क्या समझने के बाद कुछ भी समझना बाकी नहीं रहता ?
किसको जान लेने पर (वास्तव में) जगत् जाना जाता है ?
उत्तर:-शुद्ध, विज्ञान, आनन्दघन कल्याण रूप परमात्मा को ।
सर्वात्म रूप परिपूर्ण ब्रह्म के स्वरूप को।
व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा प्रस्तुत यह प्रश्नोत्तरी श्लोक अद्वैत वेदांत के गहनतम सत्य को अत्यंत सरल और तर्कपूर्ण शैली में प्रकट करता है। श्लोक में कहा गया है कि ऐसा कौन-सा तत्त्व है जिसे जान लेने पर और कुछ भी जानने की आवश्यकता शेष नहीं रहती। उत्तर में यह स्पष्ट किया गया है कि जब मनुष्य शुद्ध, विज्ञानस्वरूप, आनंदघन, कल्याणमय परमात्मा को जान लेता है, तब सम्पूर्ण जिज्ञासाओं का अंत हो जाता है। क्योंकि परमात्मा—जिसे वेदांत में ब्रह्म कहा गया है—ही वह परमार्थ सत्य है, जिसके जानने से ज्ञेय का स्वरूप ही बदल जाता है। यह ज्ञान ऐसा नहीं है कि उसमें कुछ जोड़ने या घटाने की आवश्यकता हो; यह पूर्ण है, निरपेक्ष है और द्वैत के सभी भ्रमों को मिटाने वाला है।
मनुष्य अपनी दैनिक अनुभूतियों में अनेक वस्तुओं को जानने का प्रयास करता है—कभी संसार को, कभी भगवान को, कभी मन और विचारों को। परंतु वेदांत कहता है कि जब तक ‘जानने वाला’, ‘जानने की प्रक्रिया’ और ‘जानने की वस्तु’—ये तीनों बने रहते हैं, तब तक पूर्णता का अनुभव नहीं हो सकता। परमात्मा को जानना वस्तुतः इन तीनों भेदों का लय है, जहाँ ज्ञाता ही ज्ञानस्वरूप बन जाता है। यही कारण है कि श्लोक कहता है—बुद्ध्वा न बोध्यं परिशिष्यते—अर्थात् जब उस परम सत्य का साक्षात्कार हो जाता है, तब और कुछ भी जानने योग्य नहीं बचता। वह ज्ञान किसी विषय को जानने जैसा नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने जैसा है—आत्मा को आत्मा से ही जानना।
दूसरे प्रश्न में पूछा गया है—ऐसी कौन-सी वस्तु है जिसे जान लेने पर जगत् भी ज्ञात हो जाता है? इसका उत्तर है—सर्वात्मरूप, परिपूर्ण ब्रह्म। जब व्यक्ति ब्रह्म को जानता है, तब वह समझता है कि यह सम्पूर्ण जगत् उसी ब्रह्म का विभिन्न-प्रतीतिमय विस्तार है। जैसा स्वप्न में अनेक वस्तुएँ दिखाई देती हैं, परंतु उनका आधार एक ही स्वप्नदर्शी होता है, वैसे ही यह जगत् भी विविध दिखाई देता है, परंतु उसका आधार एक ही चेतन तत्त्व—ब्रह्म है। जब मूल कारण को जान लिया जाता है, तो उसके सभी कार्य—संसार—की वास्तविकता स्पष्ट हो जाती है।
यह ज्ञान केवल बौद्धिक समझ भर नहीं है; यह अनुभूति है, जिसमें ज्ञाता का अहंकार समाप्त हो जाता है और वह अपने आप को ब्रह्म स्वरूप में अनुभव करता है। ज्ञान का यह चरम वह बिंदु है जहाँ व्यक्ति समझ जाता है कि जगत् अलग नहीं है, जीव अलग नहीं है, ईश्वर अलग नहीं है—सब एक ही सत्ता के विविध रूप हैं। इसी कारण ब्रह्म को जान लेने पर वास्तव में जगत् भी जाना हुआ माना जाता है, क्योंकि जगत् की सत्यता उसी ब्रह्म में स्थित है।
अतः शंकराचार्य का इस प्रश्नोत्तरी में उद्देश्य यह दिखाना है कि आध्यात्मिक साधना की परम परिणति ब्रह्मज्ञान है। यह वह ज्ञान है जो जीवन का उद्देश्य पूर्ण करता है; जो सारे भय, भ्रम और दुखों को मिटा देता है; जो मानव को उसकी दिव्यता का अनुभव कराता है। वास्तव में यही वह "शिवप्रसाद" है—आनंदस्वरूप, मुक्तिदायक, सुखमय ज्ञान।