Total Blog Views

Translate

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

आदि शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी (मणिरलमाला) का 26वा श्लोक

कुतो हि भीतिः सततं विधेया लोकापवादाद्भवकाननाच्च ।
को वातिबन्धुः पितरश्च के वा विपत्सहायः परिपालका ये। २६ ।

प्रश्न:-निरन्तर किस से डरना चाहिये ?
अत्यन्त प्यारा बन्धु कौन है?
और पिता कौन हैं ?

उत्तर:-लोक-निन्दा से और संसार रूपी वन से ।
जो विपत्ति में सहायता करे।
जो सब प्रकार से पालन-पोषण करें।

व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा रचित यह प्रश्नोत्तरी केवल काव्यात्मक रचना नहीं है, बल्कि जीवन के गहन सत्य को सरल और प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत करने वाली आध्यात्मिक शिक्षा है। प्रस्तुत श्लोक में वे मनुष्य को उसके व्यवहार, कर्तव्य और जीवन-दृष्टि के प्रति जागरूक करते हैं। वे बताते हैं कि मनुष्य को किससे सावधान रहना चाहिए, किसे अपना सच्चा बंधु मानना चाहिए और पिता शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है। यह शिक्षाएँ कालातीत हैं और आज के मनुष्य के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी सदियों पहले थीं।

श्लोक में कहा गया है कि मनुष्य को सर्वप्रथम दो चीज़ों से हमेशा डरना चाहिए—लोक-अपवाद अर्थात समाज की निन्दा, और संसार रूपी वन यानी भवरोग से। यहाँ ‘डरना’ का अर्थ भयभीत होना नहीं, बल्कि सचेत और सावधान रहना है। लोक-निन्दा से भय का अर्थ है कि व्यक्ति को ऐसे कर्मों से बचना चाहिए जो उसकी प्रतिष्ठा, नैतिकता और चरित्र को कलंकित करें। समाज की आलोचना से बचने का मूल उद्देश्य दिखावा नहीं, बल्कि अपने आचरण को शुद्ध और सात्विक बनाए रखना है, क्योंकि चरित्र एक बार टूट गया तो उसे फिर से सम्हालना कठिन होता है। इसी प्रकार संसार रूपी वन से सावधान रहने का अर्थ है कि यह दुनिया आकर्षणों, भ्रमों और माया से भरी है। इसमें फँसकर मनुष्य अपने लक्ष्य—आत्मकल्याण—से दूर हो सकता है। अतः चेतन, विवेकी और संयमी जीवन ही वास्तविक सुरक्षाकवच है।

श्लोक में आगे कहा गया है कि अत्यन्त प्यारा बन्धु वह है, जो विपत्ति के समय सहायता करे। शंकराचार्य यहाँ सांसारिक संबंधों के वास्तविक मूल्य को सामने रखते हैं। जो सुख में साथ दे, उसकी मित्रता सामान्य है; परन्तु जो दुःख में साथ दे, वही सच्चा मित्र है। विपत्ति में जो व्यक्ति हमारे लिए खड़ा होता है, वह केवल संबंध नहीं निभाता, बल्कि अपनी आत्मीयता, निष्ठा और प्रेम का प्रमाण देता है। यह शिक्षा मनुष्य को यह समझाती है कि केवल बाहरी दिखावे, शब्दों या सामाजिक औपचारिकताओं से बंधुता सिद्ध नहीं होती; विपत्ति की घड़ी ही सच्चे संबंधों की परीक्षा है। इसी दृष्टि से मनुष्य को यह भी सीखना चाहिए कि वह स्वयं भी दूसरों का वास्तविक बन्धु बने—अर्थात जरूरत के समय आगे आए, सहारा दे और नैतिक शक्ति का स्रोत बने।

शंकराचार्य अंत में पिता शब्द की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि सच्चे पिता वे हैं, जो सब प्रकार से पालन-पोषण करें। यह केवल शारीरिक या आर्थिक पोषण नहीं है, बल्कि मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक पोषण भी है। वास्तविक पिता वह है जो संतान को धर्म, विवेक, सदाचार और सत्य के मार्ग पर चलाना सिखाए। केवल जन्म देने वाला ही पिता नहीं होता; वह भी पिता तुल्य होता है जो मार्गदर्शन दे, रक्षा करे और जीवन में उन्नति के लिए प्रेरित करे। यह शिक्षा हमें यह समझाती है कि माता-पिता का सम्मान केवल जैविक आधार पर नहीं, बल्कि उनके उपकार, त्याग और मार्गदर्शन पर आधारित है।

इन सब शिक्षाओं का सार यह है कि मनुष्य को सावधान, कर्तव्यनिष्ठ और विवेकी होकर जीवन जीना चाहिए। उसे अपने चरित्र की रक्षा करनी चाहिए, सच्चे संबंधों को पहचानना चाहिए और उन गुरुओं, पालकों और हितैषियों का सम्मान करना चाहिए जो उसके जीवन को दिशा देते हैं। शंकराचार्य की यह प्रश्नोत्तरी मनुष्य को आत्मानुशासन, नैतिकता और सही मूल्य-बोध का पाठ पढ़ाती है, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत आवश्यक है।