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रविवार, 1 मार्च 2026

आदि शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी (मणिरलमाला) का 29वा श्लोक

पशोः पशुः को न करोति धर्म प्राधीतशास्त्रोऽपि न चात्मबोधः । 

किन्तद्विषं भाति सुधोपमं स्त्री के शत्रवो मित्रवदात्मजाद्याः । २९ ।

प्रश्न:-पशुओं से भी बढ़कर पशु कौन है ?
वह कौन-सा विष है जो अमृत-सा जान पड़ता है ?
शत्रु कौन है जो मित्र-सा लगता है ?

उत्तर:-शास्त्र का खूब अध्ययन करके जो धर्मका पालन नहीं करता और जिसे आत्मज्ञान नहीं हुआ।
नारी।
पुत्र आदि।

व्याख्या:-शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी का यह श्लोक मानवीय चरित्र, नैतिकता, आसक्ति और विवेक के अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण को प्रस्तुत करता है। इसमें साधक के जीवन में आने वाली तीन मुख्य चुनौतियों का संकेत है—धर्माचरण की उपेक्षा, स्त्री-मोह या विषय-मोह, और पुत्रादि के प्रति आसक्ति जो शत्रु होते हुए भी मित्र के समान प्रतीत होती है। इन तीनों की विवेचना मनुष्य को उसके वास्तविक आध्यात्मिक लक्ष्य से विमुख कर देती है, इसलिए शंकराचार्य अत्यंत स्पष्ट और तीखी भाषा में इनका स्वरूप उद्घाटित करते हैं।

श्लोक का पहला प्रश्न है—“पशुओं से भी बढ़कर पशु कौन है?” यह प्रश्न एक साधारण रूपक मात्र नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक अर्थों को समेटे हुए है। शंकराचार्य बताते हैं कि वह मनुष्य पशुओं से भी अधिक अधम है जिसने शास्त्रों का अध्ययन तो किया है, पर धर्म का आचरण नहीं करता और जिसने आत्मबोध प्राप्त नहीं किया। यहां “शास्त्र” मात्र ग्रंथ-पठन नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण में किए जाने वाले सत्य, करुणा, संयम, अहिंसा, सत्यनिष्ठा और आत्मचिन्तन जैसे मूल्यों का अभ्यास है। जो व्यक्ति बड़ी सरलता से शास्त्रों पर चर्चा कर लेता है, श्लोक उद्धृत कर लेता है, तर्क-वितर्क कर लेता है, ज्ञान का प्रदर्शन कर लेता है, परंतु अपने व्यवहार में इनका अनुसरण नहीं करता—वह वास्तविक अर्थों में “पशु” से भी नीचे गिर जाता है। पशु तो अपनी प्रकृति के अनुसार चलता है; वह छल, पाखंड, दम्भ, ईर्ष्या और पहचान का बोझ नहीं उठाता। पर मनुष्य यदि अपने विवेक का उपयोग न करे, संवेदनशीलता खो दे और स्वार्थ में डूब जाए, तो उसकी स्थिति प्राकृतिक पशु से भी नीची हो जाती है, क्योंकि वह चेतना-संपन्न होकर भी अचेतन जैसा आचरण करता है। शास्त्रज्ञान का उद्देश्य व्यवहार में परिवर्तन लाना है; यदि यह परिवर्तन नहीं होता, तो शास्त्र-पाठ मात्र एक अहंकार का साधन बन जाता है। इसलिए शंकराचार्य ऐसे व्यक्ति को “पशोः पशुः”—पशुओं में भी सबसे अधम पशु कहते हैं।

दूसरा प्रश्न है—“वह कौन-सा विष है जो अमृत-सा लगता है?” यहाँ “स्त्री” शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया गया है, न कि केवल किसी महिला के प्रति आकर्षण के रूप में। शंकराचार्य उस विषय-मोह, इन्द्रिय-आसक्ति और कामनाओं की ओर संकेत करते हैं जो प्रथम दृष्टि में अत्यंत मधुर प्रतीत होती हैं, किन्तु अंततः जीवन को विषाक्त कर देती हैं। जैसे अमृत दिखने वाला विष धीरे-धीरे शरीर को नष्ट कर देता है, वैसे ही विषय-वासनाएँ धीरे-धीरे मन को बाँध लेती हैं। आनंद का क्षणिक अनुभव तो मिलता है, लेकिन परिणामशः मोह, पीड़ा, निराशा, चिंता, भय और निर्बलता उत्पन्न होती है। यहां स्त्री शब्द विषय-भोग, इन्द्रियों के आकर्षण, और मन को बाँधने वाली किसी भी आसक्ति का प्रतीक है। शंकराचार्य यह नहीं कहते कि स्त्री स्वभावतः विष है; वे कहते हैं कि कामना का बंधन विष है, और यह बंधन जब मन को आच्छादित करता है, तो साधक का विवेक नष्ट हो जाता है। विषय का मधुर रूप मन को आकर्षित करता है, परंतु यह आकर्षण अमृत जैसा प्रतीत होते हुए भी अंत में विष ही सिद्ध होता है, क्योंकि यह आत्मस्वरूप से दूर ले जाता है।

श्लोक का तीसरा प्रश्न है—“शत्रु कौन है जो मित्र-सा लगता है?” उत्तर है—“पुत्र आदि”—अर्थात् वे संबंध जो सामान्यतः मनुष्य के लिए सबसे प्रिय होते हैं। यह भी एक गहरा मनोवैज्ञानिक व आध्यात्मिक संकेत है। शंकराचार्य संबंधों का विरोध नहीं करते; वे आसक्ति के दुष्परिणाम की ओर ध्यान दिलाते हैं। पुत्र, परिवार, मित्र—ये सभी जीवन में प्रिय और अनिवार्य प्रतीत होते हैं, और सामाजिक-संसारिक दृष्टि से इनका महत्त्व असंदिग्ध है। किन्तु आत्मबोध की दृष्टि से यही मोह का सबसे गहरा स्रोत बन जाते हैं। साधक का मन जब संबंधों में उलझ जाता है, तो वह निरंतर चिन्ता, अपेक्षा, भय और ममता के जाल में फँस जाता है। यह जाल उसे आन्तरिक स्वतंत्रता प्राप्त करने नहीं देता। संबंध अपने-आप में बुरे नहीं, परंतु जब वे आत्मा की स्वतंत्रता छीन लेते हैं, तो वे शत्रु की तरह बाधा बन जाते हैं, भले ही बाहरी रूप में अत्यंत प्रिय लगें। यही कारण है कि शंकराचार्य उन्हें “मित्रवत्” कहते हैं—जो दिखने में स्नेहपूर्ण हैं, लेकिन साधक की मुक्ति में अवरोध उत्पन्न करते हैं।

इस प्रकार सम्पूर्ण श्लोक मानव जीवन में तीन प्रमुख बंधनों का विश्लेषण करता है—अहंकारजनित शास्त्र-अध्ययन बिना आचरण, इन्द्रिय-विषयों का मोह जो अमृत जैसा प्रतीत होता है, और संबंधों की आसक्ति जो मित्रवत होने पर भी भीतर ही भीतर साधक की प्रगति में रोक बन जाती है। शंकराचार्य का उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं, बल्कि स्पष्ट और कटु सत्य का उद्घाटन करना है ताकि साधक अपनी सीमाओं को पहचाने, आत्मचिन्तन करे और विवेक के साथ जीवन जिए। यही विवेक मोक्ष के मार्ग का पहला और अनिवार्य चरण है।