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शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

आदि शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी (मणिरलमाला) का 28वा श्लोक

किं दुर्लभं सद्‌गुरुरस्ति लोके सत्सङ्गतिर्ब्रह्मविचारणा च।
त्यागो हि सर्वस्य शिवात्मबोधः
को दुर्जयः सर्वजनैर्मनोजः । २८ ।

प्रश्न:-संसार में दुर्लभ क्या है ?
सबके लिये क्या जीतना कठिन है ?

उत्तर:-सद्‌गुरु, सत्संग, ब्रह्म-विचार, सर्वस्व का त्याग और कल्याण रूप परमात्मा का ज्ञान ।
कामदेव ।

व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा रचित प्रश्नोत्तरी का यह श्लोक साधक के जीवन में दुर्लभ वस्तुओं और कठिनाइयों की ओर संकेत करता है। इसमें कहा गया है कि संसार में सचमुच दुर्लभ पाँच ही वस्तुएँ हैं—सद्गुरु, सत्संगति, ब्रह्म-विचार, सर्वस्व का त्याग और शिवात्मक आत्मबोध। इन पाँचों का मिलना अत्यन्त कठिन है क्योंकि ये साधारण पुरुषार्थ या बाहरी उपलब्धियों से नहीं प्राप्त होते, बल्कि अंतःकरण की पूर्ण शुद्धि, ईश्वर-कृपा और पूर्वजन्मसंचित पुण्य से उपलब्ध होते हैं। सद्गुरु दुर्लभ हैं क्योंकि केवल वही गुरु इस योग्य होता है, जो स्वयं ब्रह्मज्ञान में स्थित हो, जिसके भीतर न राग-द्वेष हो और जो शिष्य को मोक्षमार्ग में स्थिरता से मार्गदर्शन दे सके। ऐसे गुरु का मिलना अत्यन्त दुर्लभ है, क्योंकि संसार में अज्ञान की प्रबलता अधिक है और सत्य के मार्ग पर चलने वाले तथा दूसरों को ले जाने वाले विरले ही होते हैं।

सत्संगति का मिलना भी उतना ही दुर्लभ है, क्योंकि साधारणतया मनुष्य का झुकाव विषयासक्ति, अहंकार, इन्द्रियभोग और सांसारिक वृत्तियों की ओर अधिक होता है। सत्संग वह है, जहाँ मनुष्य का अन्तःकरण शुद्ध हो, शांति मिले, आत्मबोध की दिशा में प्रेरणा मिले और जीवन के वास्तविक लक्ष्य—मोक्ष—की स्मृति दृढ़ हो। ऐसे संग की उपलब्धि पुण्य के बिना सम्भव नहीं। ब्रह्म-विचार भी दुर्लभ है, क्योंकि इसके लिये तीव्र विवेक, वैराग्य और मन की स्थिरता चाहिए। सामान्य मन निरन्तर बाह्य विषयों में भटकता रहता है, पर ब्रह्म-विचार मन को भीतर की ओर मोड़कर उसे अपने वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाता है। इस विचार में स्थिर रह पाना और इसे जीवन में उतारना साधना और उत्साह के बिना संभव नहीं।

सर्वस्व-त्याग भी दुर्लभ है। यहाँ त्याग का अर्थ वस्तुओं का परित्याग मात्र नहीं, बल्कि अहंकार, आसक्ति, ‘मैं’ और ‘मेरा’ के भाव का त्याग है। वस्तुओं का त्याग करना सरल हो सकता है, परन्तु ‘मैं’ और ‘मेरा’ का त्याग करना अत्यन्त कठिन है। जब तक यह त्याग नहीं होता, आत्मबोध सम्भव नहीं होता। आत्मबोध—शिवात्मक ज्ञान—भी दुर्लभ है, क्योंकि वह केवल शुद्ध, एकाग्र और सरल हृदय पर ही प्रकट होता है। जो मन विकारों, वासनाओं और अशुद्धियों से मुक्त हो जाता है, उसी पर परमात्मा का बोध होता है। यह जीवन का परम लक्ष्य है और इसकी प्राप्ति विरलों को ही होती है।

अन्त में श्लोक कहता है कि सभी के लिये जीतना सबसे कठिन मन ही है। ‘मनोजः’ अर्थात् कामदेव यहाँ मन की वासनाशक्ति का प्रतीक है। मनुष्य संसार में बाहरी शत्रुओं को तो जीत सकता है, किन्तु अपने मन को जीतना अत्यन्त कठिन है। मन का स्वभाव चंचल है, उसे स्थिर करना, उसे विषयों से हटाकर ब्रह्म-विचार में लगाना—यह साधक के लिये सबसे बड़ी चुनौती है। यही कारण है कि मन को वश में करने के लिये शास्त्र ध्यान, साधना, जप, सत्संग और गुरु-सेवा का मार्ग बताते हैं। जब मन वश में आता है, तब ही मोक्षमार्ग सुगम होता है। इस प्रकार यह श्लोक साधक को दुर्लभ वस्तुओं की महत्ता और मन-विजय की अनिवार्यता का अत्यन्त गम्भीर उपदेश देता है।