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बुधवार, 4 मार्च 2026

आदि शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी (मणिरलमाला) का 32वा श्लोक

कण्ठङ्गता वा श्रवणङ्गता वा प्रश्नोत्तराख्या मणिरत्नमाला।

तनोतु मोदं विदुषां सुरम्यं रमेशगौरीशकथेव सद्यः । ३२ ।

यह प्रश्नोत्तर नाम की मणिरत्नमाला कण्ठ में या कानों में जाते ही लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु और उमापति भगवान् शंकर की कथा की तरह विद्वानों के सुन्दर आनन्द को बढ़ावे ।

व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा रचित यह श्लोक प्रश्नोत्तर–रूप मणिरत्नमाला की महिमा को बड़े सुंदर और काव्यमय ढंग से व्यक्त करता है। यहाँ प्रश्नोत्तर-रूप में दिए गए उपदेशों को वे मणियों की माला के समान बताते हैं, जिनका स्पर्श मात्र ज्ञानियों के हृदय में आनंद का विस्तार कर देता है। श्लोक कहता है कि यह मणिरत्नमाला—चाहे कण्ठ में धारण की जाए या कानों में सुनी जाए—उसी प्रकार पवित्र और हृदय-विलासिनी प्रतीत होती है, जैसे भगवान् विष्णु (रमेश) और भगवान् शिव (गौरीश) की कथाएँ मन को आनन्द देती हैं। इस उपमान के माध्यम से आचार्य यह बताना चाहते हैं कि प्रश्नोत्तर की यह श्रृंखला केवल बौद्धिक चर्चा नहीं है, बल्कि आत्मा को पोषण देने वाली आध्यात्मिक साधना है, जिसका फल तत्काल अनुभव किया जा सकता है।

श्लोक में "कण्ठङ्गता" और "श्रवणङ्गता" यह प्रकट करता है कि इन उपदेशों का प्रभाव तब भी होता है जब इन्हें जिह्वा से बोला जाए और तब भी जब इन्हें कानों से सुना जाए। यह द्वैध अनुभूति वेदांत की उसी परंपरा को दर्शाती है जहाँ ज्ञान का प्रसार ‘श्रवण–मनन–निदिध्यासन’ के क्रम से होता है। श्रवण से ज्ञान का बीज हृदय में पड़ता है, मनन से वह दृढ़ होता है और निदिध्यासन से वह अनुभव में परिवर्तित हो जाता है। प्रश्नोत्तर-रूप में लिखे गए ये सूत्र संक्षिप्त होते हुए भी अत्यंत प्रभावी हैं, क्योंकि वे साधक के भीतर तत्काल चिंतन को जन्म देते हैं। जैसे कोई मणि छोटी होते हुए भी अनमोल होती है, वैसे ही प्रत्येक प्रश्न और उसका उत्तर साधक को भीतर से झकझोरकर सत्य के निकट ले जाता है।

विद्वानों के लिए इस मणिरत्नमाला का आनंद इसलिए भी अद्वितीय है कि यह उनके भीतर छिपे विवेक को तीक्ष्ण बनाती है। "विदुषां सुरम्यं मोदं तनोतु"—अर्थात् यह प्रश्नोत्तरी विद्वानों में सुन्दर आनन्द को फैलाए—यहाँ 'सुरम्य' और 'मोद' शब्द संकेत करते हैं कि यह आनन्द सामान्य नहीं, बल्कि हृदय को परम शांति और पवित्रता देने वाला है। जब कोई विवेकी मनुष्य सत्य का स्पर्श करता है, तो उसके भीतर जो रस उत्पन्न होता है, वह किसी लौकिक सुख के समान नहीं होता। यह आनन्द आत्मा की अपनी प्रकृति है, जो ज्ञान के संपर्क में आते ही प्रकट होने लगती है। अतः यह प्रश्नोत्तर-माला केवल बौद्धिक अध्ययन की वस्तु न होकर, आत्मानुभूति की दिशा में बढ़ने वाले साधक के लिए प्रकाशमय मार्ग है।

श्लोक में दिया गया उपमान भी अत्यंत अर्थपूर्ण है। "रमेशगौरीशकथा"—अर्थात विष्णु और शिव की कथाएँ—भारतीय जीवन में आनन्द, भक्ति, शांति का स्रोत मानी जाती हैं। इन कथाओं में जहाँ भगवान् विष्णु की करुणा, रक्षण और अनुग्रह है, वहीं भगवान् शंकर की वैराग्य, तटस्थता और परमार्थ-निष्ठा की दिव्य प्रेरणा है। विष्णु और शिव दोनों ही मोक्षमार्ग के दो अनिवार्य पक्षों—भक्ति और ज्ञान—का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए जब शंकराचार्य इन प्रश्नोत्तरों की तुलना विष्णु-शिव कथाओं से करते हैं, तो वे बताते हैं कि यह ग्रंथ भी भक्ति और ज्ञान के सुंदर सामंजस्य को आत्मसात करने का माध्यम है। जैसे भगवान् की कथाएँ व्यक्ति को बाहरी विकारों से मुक्त कर मन को शुद्ध करती हैं, वैसे ही इस प्रश्नोत्तर-माला का चिंतन साधक को भीतर से परिष्कृत करता है।

इन प्रश्नोत्तरों की भाषा सरल होते हुए भी उनमें छिपा अर्थ अत्यंत गहन है। प्रत्येक प्रश्न जीवन के मूलभूत सत्य को स्पर्श करता है—क्या नश्वर है, क्या शाश्वत है, क्या त्याज्य है, क्या साध्य है, कौन-सा आचरण शुभ है, कौन-सा अशुभ, सच्चा मित्र कौन है, शत्रु कौन है, किससे भय रखना चाहिए और किससे नहीं। जीवन की सारी दुविधाओं का संक्षिप्त, स्पष्ट और उद्धारक उत्तर इस श्रृंखला में मिलता है। यह प्रश्नोत्तरी वेदांत की उस अत्यंत प्राचीन परंपरा की याद दिलाती है, जहाँ संवाद और प्रश्नोत्तर के माध्यम से ज्ञान का संचार किया जाता था—जैसे उपनिषदों में याज्ञवल्क्य-गार्गी, श्वेतकेतु-उद्दालक, नचिकेता-यमराज के संवाद हुए। इस परंपरा में प्रश्न साधना का साधन बन जाता है और उत्तर साधक के लिए दिशा।

मणिरत्नमाला कहने का आशय यह भी है कि जैसे मणियाँ धारण करने से शरीर सुशोभित होता है, वैसे ही इन प्रश्नोत्तरों को हृदय में धारण करने से जीवन सुशोभित होता है। यह आभूषण बाहरी नहीं, आंतरिक है। यह माला गले में नहीं, चित्त में पहनी जाती है। जिस प्रकार मणियों की चमक अंधकार को भी सुशोभित कर देती है, उसी प्रकार वेदांत के इन सूत्रों का प्रकाश अज्ञान के अंधकार को दूर कर देता है। परीक्षित और परिष्कृत ज्ञान ही मणि के समान चमकता है और साधक को अपने भीतर छिपी दिव्यता का स्मरण कराता है।

अंततः यह श्लोक इस प्रश्नोत्तरी को केवल पुस्तक का अंश नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत पवित्र और जीवनोद्धारक साधन घोषित करता है। इसकी महिमा, इसकी सारगर्भिता और इसका प्रकाश इतना प्रबल है कि जिसे भी यह माला प्राप्त होती है—शिक्षा, श्रवण, चिंतन या मनन के रूप में—उसका जीवन विष्णु-कथा और शिव-कथा के समान पवित्र, शांत और आनन्दमय हो उठता है। यही इस श्लोक का सार और शंकराचार्य का उपदेश है कि सच्चा ज्ञान वही है जो हृदय में आनंद उत्पन्न करे, मन को निर्मल बनाए और जीवन को सत्य की दिशा में ले जाए।