अहर्निशं किं परिचिन्तनीयं संसारमिथ्यात्वशिवात्मतत्त्वम् ।
किं कर्म यत्प्रीतिकरं मुरारेः क्वास्था न कार्या सततं भवाब्धौ । ३१ ।
प्रश्न:-रात-दिन विशेष रूप से क्या चिन्तन करना चाहिये ?
वास्तव में कर्म क्या है ?
सदैव किस में विश्वास नहीं करना चाहिये ?
उत्तर:-संसार का मिथ्यापन और कल्याणरूप परमात्मा का तत्त्व ।
जो भगवान् श्रीकृष्ण को प्रिय हो।
संसार-समुद्र में।
व्याख्या:-अहर्निशं किं परिचिन्तनीयं—शंकराचार्य का यह प्रश्न स्वयं साधक को उसकी साधना की दिशा समझाने वाला है। वे कहते हैं कि दिन-रात सबसे अधिक जिस बात का चिन्तन करना आवश्यक है, वह है संसार की मिथ्यात्व-प्रकृति और शिवस्वरूप आत्मा का तत्त्व। संसार की समस्त अनुभूतियाँ—वस्तुएँ, संबंध, सुख-दुःख, यश-अपयश—सब परिवर्तनशील हैं, इसलिए वास्तव में नित्य नहीं हैं। जब तक मनुष्य इन अस्थायी अवस्थाओं को सत्य समझकर उनसे आशा बाँधता है, तब तक वह मोह के जाल में फँसा रहता है। किन्तु जब वह गहराई से समझता है कि यह सब क्षणभंगुर है और एकमात्र सत्य आत्मा ही है—शुद्ध, चैतन्यरूप, अभंग, शाश्वत—तब उसके जीवन का दृष्टिकोण बदल जाता है। यही निरन्तर चिन्तन उसे वैराग्य प्रदान करता है, मोह को ढीला करता है और अन्तःकरण को शुद्ध करके ज्ञान के योग्य बनाता है। इसी कारण शंकराचार्य कहते हैं कि रात्रि-दिन आत्मतत्त्व और संसार की मिथ्यात्व-प्रकृति का मनन करना ही साधना का मूल है।
इसके बाद वे पूछते हैं—किं कर्म यत्प्रीतिकरं मुरारेः? अर्थात् वास्तव में कर्म क्या है? कौन-सा कर्म श्रेष्ठ है? उनका उत्तर स्पष्ट है—वही कर्म सच्चा है, जो भगवान श्रीकृष्ण अर्थात् ईश्वर को प्रिय हो। जो कर्म अहंकार, स्वार्थ, लोभ, आसक्ति और फल की इच्छा से रहित हो; जो लोकहित, सत्य, करुणा और कर्तव्य-बोध से प्रेरित हो; जो मन को शुद्ध करे और दूसरों के लिए प्रकाश बने—वही ईश्वरप्रिय कर्म है। गीता में श्रीकृष्ण भी यही कहते हैं—‘यत् कर्म प्रीतिकरं मे’, अर्थात् जो कर्म ईश्वर की प्रसन्नता हेतु किया जाए, उसे ही कर्मयोग कहा जाता है। ऐसा कर्म बाह्य रूप से बड़ा या छोटा नहीं होता; उसकी पवित्रता उसकी नीयत में होती है। इसे ‘निष्काम कर्म’ कहा गया है। जब मनुष्य कर्म को पूजा समझकर करता है, परिणाम को ईश्वर को समर्पित कर देता है, तब वह कर्म बन्धन से मुक्त होकर साधना का साधन बन जाता है। अतः शंकराचार्य के अनुसार सच्चा कर्म वही है, जो भगवान् के हृदय में प्रसाद उत्पन्न करे—क्योंकि उसमें अहंकार नहीं होता, केवल समर्पण होता है।
तीसरा प्रश्न है—क्वास्था न कार्या सततं भवाब्धौ? अर्थात् किस पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए? शंकराचार्य का उत्तर है—संसार-समुद्र पर। संसार को समुद्र की उपमा क्यों दी गई? क्योंकि समुद्र की तरंगें स्थिर नहीं होतीं—कभी शांत, कभी प्रचंड; कभी मधुर, कभी भयानक। उसी प्रकार संसार में सुख और दुःख, लाभ और हानि, यश और अपयश, जन्म और मृत्यु निरन्तर बदलते रहते हैं। जो आज है, वह कल नहीं रहेगा। यदि मनुष्य इस चंचल संसार पर भरोसा करता है, तो उसे बार-बार निराश होना पड़ता है। इसके अतिरिक्त संसार का स्वभाव खींचने का है—वह अपनी आकर्षक तरंगों से साधक को उलझाकर लक्ष्य से भटका देता है। इसीलिए इसे ‘भवाब्धि’ कहा गया—भव का समुद्र, जहाँ जन्म-मरण और मोह की लहरें निरन्तर उठती-बैठती रहती हैं।
साधक को यही समझाया गया है कि संसार पर विश्वास करने का अर्थ है कि वह उसकी स्थिरता को स्वीकार कर रहा है, जबकि वह अस्थिर है। जो अस्थिर है, उस पर भरोसा करने से मन अस्थिर ही रहेगा। जब तक मनुष्य यह मानता रहेगा कि संसार ही उसकी सुरक्षा, सुख और संतोष का आधार है, तब तक वह भय, चिंता और दुःख से मुक्त नहीं हो सकता। इसलिए शंकराचार्य कहते हैं कि साधक को कभी भी संसार में स्थायित्व का भरोसा नहीं रखना चाहिए; उसे परमात्मा पर भरोसा रखना चाहिए, जो नित्य है, अविनाशी है और सभी परिवर्तनों के पीछे का अपरिवर्तनशील आधार है।
तीनों प्रश्नों का सार यह है कि मनुष्य अपना चिन्तन शुद्ध करे, कर्म को ईश्वरार्पण बनाए और संसार की अस्थिरता को जानकर उससे मुक्त होने का प्रयास करे। जब साधक दिन-रात आत्मा की सत्यता और संसार की मिथ्यात्वता पर मनन करता है, तभी उसके भीतर विवेक की ज्योति जलती है। जब वह ईश्वरप्रिय कर्म करने को ही अपना धर्म समझता है, तब उसका हर कार्य आध्यात्मिक होता है। और जब वह संसार में स्थायित्व खोजने के भ्रम से मुक्त होता है, तभी वह मुक्तिपथ पर दृढ़ता से आगे बढ़ सकता है। यही अद्वैत का मार्ग है—आत्मा के सत्य को पहचानना, कर्म को शुद्ध करना और संसार को उसके वास्तविक स्वरूप में देखना।