"साधना सम्बन्धी नौ प्रश्न" (भाग-1)
ॐ !! वंदे गुरु परंपराम् !! ॐ
पूज्य गुरुदेव कहते है कि वेदान्त (ज्ञान-मार्ग) किसी कल्पना या आश्वासन पर आधारित नहीं है और न ही मृत्यु के बाद किसी मुक्ति पर विश्वास करता है। उपनिषद् विद्या जीते जी साधक की सच्ची समझ का विकास करते हुए उसके सभी संशयों, भ्रमों, गलत धारणाओं से मुक्त करती है। इसलिए वेदान्त के जिज्ञासु साधक को गुरु, आचार्य की सेवा में उपस्थित होकर तब तक प्रश्न करते रहना चाहिए जब तक उसे अपरोक्ष अनुभव नहीं हो जाता। उपनिषदों में वर्णित इन्द्र और विरोचन की कथा इस तथ्य को और अधिक स्पष्ट करती है कि विरोचन एक ही बार गुरुजी के पास जाकर संतुष्ट हो गया जबकि इन्द्र बार-बार गुरुजी के पास जाकर अपने प्रश्नों का समाधान करता रहा।
आचार्य शंकर भज गोविंदम में जिज्ञासु को सुचेत करते हुए कहते हैं-
कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः,का मे जननी को मे तातः।
इति परिभावय सर्वमसारम्, विश्वं त्यक्त्वा स्वप्न विचारम् ॥२३॥
अर्थात हे साधक तुम कौन हो, मैं कौन हूँ और कहाँ से आये हैं ? इस बात का विचार करो ? क्योंकि जब तक हमारी जिज्ञासा सच्ची नहीं होगी तब-तक हमारी यात्रा शुरू नहीं होगी। हमारी स्थिति तो उस व्यक्ति जैसी होगी जो प्रतिदिन रेलवे स्टेशन जाता है, रेलगाडियों के आने-जाने की जानकारी प्राप्त करता है परन्तु जाता कहीं भी नहीं। सन्त कबीर जी के शब्दों में --------------"
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण इसी तथ्य की पुष्टि करते हुए कहते है:----
तद्-विद्धि प्रणिपातेन, परि-प्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं, ज्ञानिनस्-तत्त्व-दर्शिनः ॥ 34॥
(गीता 4/34)
कि ज्ञान की प्राप्ति के लिए तू कपट छोडकर तत्वदर्शी ज्ञानियों से श्रद्धापूर्वक प्रश्न कर ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !!
शेष दूसरे भाग में
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