"ब्रह्म विद्या का प्रचार"
ॐ !! वंदे गुरु परंपराम् !! ॐ
जो ब्रह्म से च्युत हो गया; जो वेदान्त से नीचे गिर गया, वह तो गिरा-गिराया ही है। उसको गिराने की आवश्यकता नहीं है। जगत् में इस बहा विद्या का प्रचार करके लोगों को धीरे-धीरे इस रास्ते पर लाना चाहिए। धन्य हैं वे महापुरुष, जो लोगों को इधर लाने का प्रयल कर रहे हैं और धन्य हैं वे लोग, जो इस रास्ते पर आ रहे हैं।
इस संसार में आप कहाँ सुखी होंगे ? क्या करके सुखी होंगे ? आप कब तक जवान बने रहेंगे ? आज नहीं, तो कल तो बुढ़ापा आएगा ही। पैसे से कब तक चैन मनायेंगे आपकी इन्द्रियाँ कब तक समर्थ रहेंगी? बुद्धि कब तक आपका साथ देगी ? स्मरण शक्ति कब तक बनी रहेगी ? यहाँ सदैव के लिए कुछ भी टिकने वाला नहीं है। जो टिका ही रहता है, जो बुद्धि के और स्मरणशक्ति के कमजोर हो जाने पर भी रहता है; उसी को 'मैं' जानो। जब स्मरणशक्ति कमजोर हो जाए, तब देखना कि साक्षी हो कि नहीं? जब मन न लगे, तब देखना कि साक्षी हो कि नहीं? क्या साक्षी भी होना पड़ेगा ? नहीं, साक्षी तो तुम हो ही। इसीलिए, मैं कहता हूँ कि जिसने एक बार इसको ठीक से जाना; उसके लिए कुछ करना बाकी नहीं रहता। इसलिए, सच्चे मन से इस मार्ग के अनुगामी बनो।
आपको फिर इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी कि-
'सांवला निकट हो, जब प्राण तन से निकलें।'
नहीं तो, फिर गुरूजी आप ही आ जाना। बंसी के वट से तो पीछा छुड़ाया, पर व्यासा वालों पर लटक गए। अब मरते समय वे आएँगे। पहले मरते समय कृष्ण भगवान् आते थे। वे गोलोक ले जाते थे; गो धाम ले जाते थे। अब ये राधास्वामी वाले गुरूजी आएँगे और मरने वाले चेलों को स्वर्ग ले जाएँगे। स्वर्ग ले जाने वाली बेईमानी समाज से नहीं गई। ये ठग लोग धरती पर बने ही रहे। इनको मौत नहीं आई।
मैं कहता हूँ कि यदि जीते-जागते सन्देश नहीं दे सकते; तो दूसरों की मान्यताएँ काट के, नई मान्यताएँ थोपने वाले तुम कौन होते हो ? हमारे जो प्रतिनिधि भगवान् थे, उनको हटा कर, ये मूर्तियों की लाइन लगाने वाले आनन्दपुर वाले कौन होते हैं? ऐसे आडम्बरियों का बाजार सदा लगा ही रहा है। उनकी मूर्तियाँ हटा कर अब मेरी रख दो। इनसे तो आर्यसमाजी अच्छे हैं।
तुम देह की पूजा कराने वालों; देह को भगवान् की जगह बिठाने वालों; भगवान् को भगवान् न बताने वालों के चक्कर में न फँसो। ये सब तुम्हें तत्त्वज्ञान से विमुख करके; उस आत्मज्ञान से विमुख करके ऊपर के किसी न किसी आडम्बर में लगा देने वाले हैं। वहाँ तक तो मैं उन सबका साथी हूँ, जो लोगों को धीरे-धीरे ज्ञान की ओर लाने में लगे हैं। इसमें मुझे कोई विरोध नहीं है। सगुण से लाओ, निर्गुण से लाओ, प्रकाश से लाओ, नाद से लाओ, भजन से लाओ; किसी भी तरीके से लाओ, लेकिन, ज्ञान की ओर लाओ। किसी भी दृश्य वस्तु में सत्पना, चित्पना और आनन्दपना नहीं है। दृश्य का जो आश्रय है; दृश्य का जो प्रकाशक है और दृश्य का जो साक्षी है; वही सत् है, वही चित् है, वही आनन्द है और वही बहा है।
वही अखण्ड, अनन्त है। इसके अलावा कोई भी अखण्ड नहीं है; कोई भी अविनाशी नहीं है और कोई भी प्रकाश स्वरूप नहीं है। इस चित् तत्त्व के अलावा कोई प्रकाशक नहीं है। इन्द्रियाँ भी प्रकाशक नहीं है और बुद्धि भी प्रकाशक नहीं है।
ये सब पराधीन हैं। स्वयं प्रकाश तो यह चैतन्य अपना-आप ही है। 'आप' बहुत नहीं है। एक ही तत्त्व है। वहाँ कोई बहुत नहीं है। इसलिए, अंहकार आदि के निवृत्त होने पर, अहंकार के बाध होने पर, सारे विश्व में चित् तत्त्व एक ही है। वही ब्रह्म है। उससे न तुम जुदा हो; न मैं जुदा हूँ और न अन्य कोई जुदा है और न कोई जुदा रह सकता है। ऐसा जानो और कृतकृत्य हो जाओ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !!
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