"विवेकचूडामणि ग्रंथ का 216वां श्लोक"
ॐ !! वंदे गुरु परंपराम् !! ॐ
"आत्मस्वरूप-निरूपण"
"श्रीगुरुरुवाच"
सर्वे येनानुभूयन्ते यः स्वयं नानुभूयते ।
तमात्मानं वेदितारं विद्धि बुद्ध्या सुसूक्ष्मया ॥ २१६ ॥
अर्थ:-ये सब जिसके द्वारा अनुभव किये जाते हैं और जो स्वयं अनुभव नहीं किया जा सकता, अपनी सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा उस सबके साक्षी को ही तू अपना आत्मा जान।
विवेकचूडामणि का यह श्लोक आत्मस्वरूप की अद्भुत स्पष्टता प्रदान करता है। यहाँ शंकराचार्य यह बताने का प्रयत्न कर रहे हैं कि आत्मा वह है जिसके द्वारा समस्त अनुभव सम्भव होते हैं, परंतु जिसे स्वयं किसी बाह्य साधन या इन्द्रिय के माध्यम से अनुभव नहीं किया जा सकता। जो देखा जाता है, सुना जाता है, सोचा जाता है, चाहा जाता है, जाना जाता है—उन सभी के पीछे एक साक्षी तत्व विद्यमान है। वही साक्षी तत्व आत्मा है। श्लोक में कहे गए “सर्वे येनानुभूयन्ते”—अर्थात् जगत के सभी विषय, देह, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार आदि जिनके द्वारा अनुभव किए जाते हैं—उन सबके अनुभवकर्ता एक ही है। अनुभव होने के लिए दो तत्त्व आवश्यक हैं—एक अनुभव का विषय और दूसरा अनुभवकर्ता। विषय परिवर्तित होते रहते हैं, अनुभव के क्षेत्र बदलते रहते हैं, परंतु अनुभवकर्ता सदैव एक, अपरिवर्तनीय और साक्षीरूप रहता है।
आगे कहा गया है—“यः स्वयं नानुभूयते”—जो स्वयं किसी अन्य साधन द्वारा अनुभव का विषय नहीं बनता। इसका अर्थ यह है कि आत्मा ‘दृश्य’ नहीं, बल्कि ‘द्रष्टा’ है। वह जानने वाला है, परंतु ज्ञेय नहीं। उसे किसी इन्द्रिय से नहीं जाना जा सकता, क्योंकि इन्द्रियाँ स्वयं जड़ हैं और प्रकाश आत्मा का है। वह मन द्वारा नहीं जाना जा सकता, क्योंकि मन भी एक जानने का उपकरण है, और उपकरण उपयोगकर्ता को नहीं जान सकता। अग्नि अपने आप को नहीं जला सकती, नेत्र अपने आप को नहीं देख सकते—इसी प्रकार मन और बुद्धि आत्मा को वस्तु बनाकर नहीं जान सकते। आत्मा को जानने का अर्थ है उसके साक्षीभाव को समझना, न कि उसे किसी वस्तु की तरह अनुभव करना।
श्लोक कहता है—“तमात्मानं वेदितारं विद्धि”—उसी अनुभवकर्ता को अपना आत्मा समझ। आत्मा वह नहीं है जो बदलता है, उत्पन्न होता है, लुप्त होता है या क्रियाएँ करता है। वह मात्र साक्षी है—जो देह के परिवर्तन, मन की वृत्तियों, बुद्धि के निर्णयों तथा अहंकार की चेष्टाओं को जानता है, परंतु उनमें भाग नहीं लेता। जैसे सूर्य जल, धरती या बादलों के कार्यों में भाग नहीं लेता, केवल प्रकाश देता है, उसी प्रकार आत्मा भी केवल प्रकाशक है। वह अनुभव का मूल है, अनुभव का आधार है और अनुभव का साक्षी है।
अंत में कहा गया—“बुद्ध्या सुसूक्ष्मया”—अर्थात् अत्यन्त सूक्ष्म, निर्मल, एकाग्र और विवेकपूर्ण बुद्धि द्वारा ही आत्मा को जाना जा सकता है। सामान्य बुद्धि, जो राग-द्वेष, संशय और अज्ञान से ढकी रहती है, वह आत्मा का साक्षात्कार नहीं कर सकती। जब बुद्धि को शुद्ध किया जाता है, जब मन शांत होता है और विवेक प्रबल होता है, तभी आत्मा का साक्षात् अनुभव होता है—जो वास्तव में ‘अनुभव’ नहीं, बल्कि 'स्वयं में स्थित होना' है, क्योंकि आत्मा तो सदैव प्रकट है, केवल अज्ञान का आवरण हटाना होता है। इस प्रकार यह श्लोक समझाता है कि आत्मा वही है जो अनुभवकर्ता है, जो स्वयं कभी अनुभव का विषय नहीं बनता, और जिसे सूक्ष्म विवेकशील बुद्धि द्वारा जाना जाता है।
!! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !!