"विवेकचूडामणि ग्रंथ का 220वां श्लोक"
ॐ !! वंदे गुरु परंपराम् !! ॐ
"आत्मस्वरूप-निरूपण"
"श्रीगुरुरुवाच"
घटोदके विम्बितमर्कविम्ब-मालोक्य मूढो रविमेव मन्यते ।
तथा चिदाभासमुपाधिसंस्थं भ्रान्त्याहमित्येव जडोऽभिमन्यते ॥ २२० ॥
अर्थ:-जिस प्रकार मूढ़ पुरुष घड़े के जलमें प्रतिविम्बित सूर्यविम्ब को देखकर उसे सूर्य ही समझता है, उसी प्रकार उपाधि में स्थित चिदाभास को अज्ञानी पुरुष भ्रम से अपना-आप ही मान बैठता है।
विवेकचूडामणि के इस श्लोक में आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदान्त के एक अत्यन्त सूक्ष्म और गहन सिद्धान्त—चिदाभास, अहंकार और आत्मा के अंतर—को अत्यन्त सरल उपमा के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। श्लोक में कहा गया है कि जैसे कोई अज्ञानी व्यक्ति घड़े के भीतर भरे जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब देखकर उसे ही वास्तविक सूर्य समझ लेता है, उसी प्रकार देह-मन-बुद्धि रूपी उपाधियों में प्रतिबिम्बित चेतना—चिदाभास—को अज्ञानी व्यक्ति “मैं” मान लेता है। इस प्रतीत ‘मैं’ को ही अहंकार कहा जाता है, जो आत्मा का नहीं, बल्कि उपाधि का उत्पाद है। यहाँ शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि आत्मा स्वयं शुद्ध, निरुपाधिक, असीम और सर्वव्यापी है, किन्तु जब वह मन-बुद्धि के उपाधि रूप घड़े में प्रतिबिम्बित होती है, तब ‘चेतना का प्रतिबिम्ब’ उत्पन्न होता है। यही प्रतिबिम्ब चिदाभास कहलाता है।
अज्ञानी व्यक्ति अपनी पहचान इस चिदाभास से जोड़ लेता है। वह मानता है— “मैं शरीर हूँ, मैं मन हूँ, मैं बुद्धि हूँ, मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ।” यह मान्यता उतनी ही भ्रांति है जितनी घड़े के जल में दिखने वाले सूर्य को ही वास्तविक सूर्य मानना। जिस प्रकार सूर्य जल में प्रतिबिम्बित हो रहा है, पर वास्तव में सूर्य जल में नहीं है, उसी प्रकार आत्मा देह-मन में प्रतीत होती है, पर वास्तव में आत्मा न तो शरीर में है, न मन में, न बुद्धि में। प्रतिबिम्ब मात्र उपाधि-सम्बन्ध से उत्पन्न प्रतीति है, वास्तविक सत्ता नहीं। यह भ्रांति तभी होती है जब व्यक्ति वास्तविक सूर्य के स्वरूप से अनजान होता है। ठीक इसी प्रकार, आत्मा के वास्तविक स्वरूप को न जानने वाला जीव चिदाभास को ही “मैं” मान लेता है और जीवनभर उसे ही अपनी वास्तविक पहचान समझता रहता है।
यह श्लोक सीमित और असीम के भेद का संकेत भी देता है। चिदाभास सीमित है— वह सोचता है, दुखी होता है, प्रसन्न होता है, बदलता है, नष्ट होता है। जब शरीर सोता है तो वह भी लीन हो जाता है; जब शरीर मरता है तो वह भी समाप्त हो जाता है। इसके विपरीत आत्मा कभी नहीं बदलती, कभी नष्ट नहीं होती, कभी दूषित नहीं होती। वह सदा एकरस, शुद्ध, चेतन, अनन्त है। जैसे सूर्य पर जल की गंदगी, घड़े का आकार या प्रकाश की कमी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वैसे ही आत्मा पर देह-मन-बुद्धि के विकारों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। लेकिन अज्ञानवश मनुष्य उन्हीं विकारों को अपनी पहचान बना लेता है—“मैं दुखी हूँ”, “मैं पापी हूँ”, “मैं कर्ता हूँ”, आदि। यह सब अहंकार की भ्रांतियाँ हैं, आत्मा का सत्य स्वरूप नहीं।
जब साधक श्रवण-मनन-निदिध्यासन के द्वारा उपाधियों का मिथ्यात्व समझने लगता है, तब उसे धीरे-धीरे यह बोध होता है कि “मैं चिदाभास नहीं हूँ, मैं शरीर-मन-बुद्धि नहीं हूँ; मैं वह शुद्ध चैतन्य हूँ जिसमें यह सब प्रतिबिम्बित हो रहा है।” यही विवेक का उदय है और मोक्ष का आरम्भ भी। जैसे सूर्य का वास्तविक रूप जान लेने पर व्यक्ति जल में प्रतिबिम्ब को सूर्य नहीं मानता, वैसे ही आत्मा के तत्त्व का ज्ञान होने पर साधक चिदाभास, अहंकार और देह को “मैं” नहीं मानता। इस प्रकार यह श्लोक ज्ञान और अज्ञान के भेद, तथा आत्मा और अहंकार के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करके साधक को आत्मस्वरूप की दिशा में अग्रसर करता है।
!! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !!