"विवेकचूडामणि ग्रंथ का 221, 222 वां 223 श्लोक"
ॐ !! वंदे गुरु परंपराम् !! ॐ
"आत्मस्वरूप-निरूपण"
"श्रीगुरुरुवाच"
घटं जलं तद्गतमर्कविम्बं विहाय सर्वं विनिरीक्ष्यतेऽर्कः ।
तटस्थ एतत्त्रितयावभासकः स्वयंप्रकाशो विदुषा यथा तथा ॥ २२१ ॥
देहं धियं चित्प्रतिविम्बमेतं विसृज्य बुद्धौ निहितं गुहायाम्।
द्रष्टारमात्मानमखण्डबोधं सर्वप्रकाशं सदसद्विलक्षणम् ॥ २२२॥
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्म-मन्तर्बहिःशून्यमनन्यमात्मनः विज्ञाय सम्यङ्निजरूपमेतत् पुमान्विपाप्मा विरजो विमृत्युः ॥ २२३ ॥
अर्थ:-विद्वान् पुरुष घड़ा, जल और उसमें स्थित सूर्य का प्रतिविम्ब-इन सबको छोड़कर जैसे इन तीनों के प्रकाशक इनसे पृथक् और स्वयंप्रकाश रूप सूर्य को देखता है, उसी प्रकार देह, बुद्धि और चिदाभास- इन तीनों को छोड़कर बुद्धिगुहा में स्थित साक्षी रूप इस आत्मा को अखण्डबोध स्वरूप, सबके प्रकाशक और सत्-असत् दोनों से भिन्न, नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्म, भीतर-बाहर के भेद से रहित और अपने-आपसे सर्वथा अभिन्न इस-(आत्मा) को भलीभाँति अपना निज रूप जान कर पुरुष पाप रहित, निर्मल और अमर हो जाता है।
ऊपर दिए गए तीनों श्लोक (विवेकचूडामणि 221–223) अद्वैत वेदान्त के अत्यन्त गूढ़ रहस्य को प्रकट करते हैं—वह यह कि शरीर, मन, बुद्धि और चिदाभास जैसी उपाधियाँ नितान्त मिथ्या हैं, और इन सबके प्रकाशक, साक्षी, निरुपाधिक, स्वयंप्रकाश आत्मा ही हमारा वास्तविक स्वरूप है। शंकराचार्य यहाँ अत्यन्त सुन्दर दृष्टान्त के माध्यम से साधक को अन्तर्मुख होकर यह पहचान करवाते हैं कि जब तक मनुष्य ‘घड़ा–जल–विम्ब’ रूप उपाधियों को ही अपना स्वरूप मानता है, तब तक वह सत्य आत्मा—जो सूर्य की भाँति स्वतःप्रकाश है—को नहीं देख पाता। किन्तु जैसे विवेकी पुरुष प्रतिविम्ब को त्यागकर मूल सूर्य को पहचानता है, वैसे ही साधक को भी अपने भीतर स्थित साक्षी चैतन्य को आत्मा के रूप में पहचानना चाहिए। अब इन श्लोकों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत है।
जैसे एक व्यक्ति मिट्टी के घड़े में भरे हुए जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब देखता है, तो वह असली सूर्य को तब तक नहीं पहचान पाता जब तक कि वह घड़े को, जल को और वर्तमान प्रतिबिम्ब को – इन तीनों को छोड़कर ऊपर की ओर न देखकर वास्तविक सूर्य को न देख ले। इस दृष्टान्त का सूक्ष्म भाव यह है कि ‘घड़ा’ शरीर के समान है, ‘जल’ बुद्धि या अन्तःकरण के समान है, और ‘सूर्य का प्रतिविम्ब’ चिदाभास के समान है—जो चेतन नहीं है, किन्तु चेतन के समीप होने से चेतन जैसा प्रतीत होता है। साधारण व्यक्ति यही मान लेता है कि जल में जो चमक रहा है वही सूर्य है; ठीक उसी प्रकार अज्ञानी व्यक्ति यह समझता है कि ‘मैं यह देह हूँ’, ‘मैं यह मन हूँ’, ‘मैं यह बुद्धि हूँ’ या ‘मैं यह अहंकार हूँ’। परन्तु विवेकी पुरुष जानता है कि जैसे सूर्य का प्रतिविम्ब केवल प्रतीति है, वास्तविक सूर्य नहीं; वैसे ही अहंकार, मन, बुद्धि और चिदाभास केवल प्रतीति है, वास्तविक आत्मा नहीं।
शंकराचार्य कहते हैं कि जिस प्रकार विद्वान पुरुष घड़े, पानी और प्रतिबिम्ब—इन तीनों को त्यागकर उनके प्रकाशक सूर्य को पहचान लेता है, उसी प्रकार साधक को भी देह, बुद्धि और चिदाभास—इन तीनों को छोड़कर अन्तःकरण-गुहा में स्थित उस साक्षी को पहचानना चाहिए जो इन सबका प्रकाशक है। यह साक्षी न तो देह के साथ बदलता है, न मन के साथ, न बुद्धि के साथ। शरीर बाल्यावस्था से वृद्धावस्था तक बदलता रहता है, पर आत्मा सदा वैसा ही रहता है। मन और बुद्धि कभी प्रसन्न, कभी दुःखी, कभी संशयग्रस्त, कभी उत्साहित, कभी निश्चेष्ट रहते हैं—पर आत्मा इन परिवर्तनों का केवल साक्षी है, स्वयं इनमें भागी नहीं। चिदाभास—जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब—कभी प्रखर, कभी मंद, कभी विकृत, कभी अस्पष्ट प्रतीत होता है; पर आत्मा सदा समान है, अविकार है, स्वयंप्रकाश है।
आत्मा को ‘अखण्डबोध’ कहा गया है, क्योंकि उसमें कोई विभाजन नहीं है; जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—सभी अवस्थाओं में वह निरन्तर प्रकाशित रहता है। न वह देह में सीमित है, न मन में; न उसमें कोई प्रकार की वृत्ति है; न वह किसी गुण, धर्म या क्रिया से बँधा है। वह सबका प्रकाशक है, अर्थात् सभी अनुभूतियों, विचारों, स्मृतियों और संवेदनाओं का आधार है। देह को हम देखते हैं, अतः आत्मा उससे भिन्न है; मन को हम जानते हैं, इसलिए आत्मा उससे भी भिन्न है; बुद्धि पर भी हमें साक्षित्व है, इसलिए आत्मा उससे भी भिन्न है। यहाँ तक कि चिदाभास—जो बुद्धि में प्रकट हुआ चेतना का प्रतिबिम्ब है—उस पर भी आत्मा साक्षी है, अतः आत्मा उससे भी अलग है।
श्लोक 222 में कहा गया है कि “देहं धियं चित्प्रतिविम्बमेतं विसृज्य”—देह, बुद्धि और चिदाभास—इन सबको छोड़कर ‘बुद्धिगुहा’ में स्थित उस साक्षी को पहचानो। ‘बुद्धिगुहा’ का अर्थ यह है कि बुद्धि के भीतर स्थित वह सूक्ष्म कक्ष जहाँ हमारी समस्त अनुभूतियाँ प्रतिबिम्बित होती हैं, और जहाँ आत्मा का साक्षात्कार सम्भव होता है। आत्मा को ‘अखण्डबोध’ कहा गया है, क्योंकि उसमें ज्ञान का कोई तुकड़ा नहीं है, कोई सीमित भाग नहीं है—वह निरन्तर, सर्वत्र, अखण्ड चेतना है। उसे ‘सर्वप्रकाशक’ कहा गया है, क्योंकि वही विषयों, विचारों, स्वप्नों, भावनाओं—सबको प्रकाशित करता है। यदि आत्मा न हो, तो कोई भी वस्तु ज्ञात ही न हो सके। उसे ‘सदसद्विलक्षण’ कहा गया है—अर्थात् वह ‘सत्’ (जैसे देह आदि जो परिवर्तनशील हैं) नहीं है, और न ‘असत्’ (जो कभी था ही नहीं); बल्कि वह इन दोनों से परे है। ‘सत्-असत्-विलक्षण’ यह सूचित करता है कि आत्मा न तो पदार्थ की श्रेणी में आता है, न अभाव की; आत्मा तो चैतन्य है—जो सदा, सर्वत्र, अविकारी और स्वतःप्रकाश है।
तीसरे श्लोक में कहा गया है कि यह आत्मा ‘नित्य’, ‘विभु’, ‘सर्वगत’, ‘सूक्ष्म’, ‘अन्तर्बहिःशून्य’, ‘अनन्य’ आदि गुणों से युक्त है। ‘नित्य’ का अर्थ है—जिसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। देह बदलता है, मन बदलता है, बुद्धि बदलती है, चिदाभास भी बदलता है—किन्तु आत्मा सदा समान रहता है। ‘विभु’ और ‘सर्वगत’ का अर्थ है—जो सर्वत्र है, किसी स्थान में सीमित नहीं। शरीर किसी स्थान में है, मन भी एक सीमा तक रहता है, बुद्धि भी सीमित है; पर आत्मा सर्वत्र है, वह स्थान का विषय नहीं है। ‘सूक्ष्म’ का अर्थ है—जिसे इन्द्रियाँ पकड़ नहीं सकतीं, जिसे मन सोच नहीं सकता। आत्मा इतना सूक्ष्म है कि वह किसी प्रत्यक्ष या परोक्ष साधन से ज्ञेय नहीं—केवल स्वयं प्रकाशित अनुभव से जाना जाता है।
“अन्तर्बहिः शून्यमनन्यमात्मनः”—आत्मा न भीतर है न बाहर, क्योंकि ‘भीतर’ और ‘बाहर’ ये देह के संदर्भ में बने हुए द्वन्द्व हैं। आत्मा देह का विषय नहीं, अतः उसे दिशाओं, स्थान, सीमाओं के आधार पर नहीं बाँधा जा सकता। वह अपनी सत्ता में एकरस, निरुपाधिक, अभिन्न और पूर्ण है। वह 'अनन्य' है—अपने आप से ही एक, किसी भी अन्य तत्त्व के साथ मिश्रित नहीं। यही कारण है कि उसे पहचान लेने पर मनुष्य ‘विरजः’—रज, तम, पाप, बन्धन आदि से रहित हो जाता है। क्योंकि बन्धन तो उपाधियों से उत्पन्न होता है: मैं देह हूँ, मैं मन हूँ, मैं बुद्धि हूँ—इन मिथ्या परिचयों से ही बन्धन उपजता है। जब उपाधियाँ ही असत्य जानी गईं, और आत्मा को उपाधियों से भिन्न पहचाना गया, तब बन्धन का प्रश्न ही नहीं रहता। इसीलिए उसे “विमृत्युः” कहा गया—जो मृत्यु से परे है। मृत्यु देह की है, जन्म देह का है; शरीर, मन, बुद्धि—इन सबकी उत्पत्ति और विनाश है, पर आत्मा सदा अविकारी, सदा अपरिणामी, सदा अस्तित्वमात्र है। जिसने आत्मा को पहचान लिया वह मृत्यु से मुक्त माना जाता है।
इन तीनों श्लोकों का सार यह है कि आत्मा का अनुभव ‘त्याग’ से होता है, ‘प्राप्ति’ से नहीं। आत्मा को नया करके पाना नहीं है—वह तो प्रतिक्षण, हर अनुभव में उपस्थित है। बस, हम शरीर, मन, बुद्धि और चिदाभास—इन उपाधियों को अपना मानकर भ्रमित हो जाते हैं। जब साधक इन उपाधियों का सूक्ष्म विवेक करता है, उन्हें साक्षात् देखता है, उनका साक्षी बनता है, तब सहज ही यह ज्ञात होता है कि इनमें से कोई भी ‘मैं’ नहीं हूँ। मेरा शरीर जाग्रत में देखा जाता है, स्वप्न में बदल जाता है, सुषुप्ति में लुप्त हो जाता है—अतः मैं शरीर नहीं। मन निरन्तर बदलता है—अतः मैं मन नहीं। बुद्धि निर्णय करती है, संशय करती है—अतः मैं बुद्धि नहीं। यहाँ तक कि “मैं-मैं” कहने वाला अहंकार भी जन्म लेता है और मिट जाता है—अतः मैं अहंकार भी नहीं। परंतु इन सबको जानने वाला जो साक्षी है—जिसके प्रकाश में देह, मन और चिदाभास की अनुभूति होती है—वही मैं हूँ। वही आत्मा है। वही ब्रह्मस्वभाव है।
अतः निष्कर्ष यह है कि जो व्यक्ति घड़ा, जल और प्रतिबिम्ब की उपाधियों को त्यागकर असली सूर्य को पहचान लेता है—वह जानता है कि प्रकाश का स्रोत वही सूर्य है; उसी प्रकार जो साधक देह, मन, बुद्धि और चिदाभास की उपाधियों को अपने से भिन्न जानकर साक्षी चैतन्य को अपना वास्तविक रूप पहचान लेता है—वह मोक्ष को प्राप्त होता है। वह तुरंत ‘विरजः’, ‘विपाप्मा’ और ‘विमृत्युः’ बन जाता है—अर्थात् पाप, रजस-तमस और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त, निर्मल, शुद्ध, पूर्ण ब्रह्मरूप हो जाता है। यही इन श्लोकों का गम्भीर और परम पावन संदेश है।
!! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !!