"विवेकचूडामणि ग्रंथ का 224वां श्लोक"
ॐ !! वंदे गुरु परंपराम् !! ॐ
"आत्मस्वरूप-निरूपण"
"श्रीगुरुरुवाच"
विशोक आनन्दघनो विपश्चित् स्वयं कुतश्चिन्न बिभेति कश्चित् ।
नान्योऽस्ति पन्था भवबन्धमुक्ते-र्विना स्वतत्त्वावगमं मुमुक्षोः ॥ २२४॥
अर्थ:-वह अति बुद्धिमान् पुरुष शोकरहित और आनन्दघनरूप हो जाने से कभी किसी से भयभीत नहीं होता। मुमुक्षु पुरुष के लिये आत्मतत्त्व के ज्ञान को छोड़ कर संसार बन्धन से छूटने का और कोई मार्ग नहीं है।
विवेकचूड़ामणि के इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण श्लोक में शंकराचार्य जिज्ञासु साधक को आत्मज्ञान की अंतिम और निर्णायक भूमिका समझाते हैं। श्लोक का सार यह है कि जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप—आत्मा—का साक्षात्कार कर लेता है, तब उसके भीतर के समस्त शोक और भय स्वतः नष्ट हो जाते हैं। अज्ञान ही दुख, भय, मोह, राग और बंधन का वास्तविक कारण है; और ज्ञान ही उनका एकमात्र समाधान। इसलिए यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि जो पुरुष अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेता है—वह विशोक अर्थात् पूर्णतः शोक-रहित होता है। उसके भीतर कोई मानसिक संघर्ष, असुरक्षा या पीड़ा शेष नहीं रहती, क्योंकि ये सभी अविद्या की उपज होते हैं। जब ज्ञानी यह जान लेता है कि वह न शरीर है, न मन है, न बुद्धि है, बल्कि उनसे परे शुद्ध, निराकार, निर्विकार चेतन स्वरूप है, तब शोक का कोई आधार ही नहीं बचता। शोक तभी रहता है जब ‘मैं’ शरीर मानकर वस्तुओं में हानि या लाभ का अनुभव करता हूँ; परंतु आत्मस्वरूप में स्थित होकर देखने पर न कोई हानि है, न कोई प्राप्ति—सब कुछ केवल साक्षीभाव से प्रकाशित होता है।
इसी प्रकार श्लोक कहता है कि वह आनन्दघन हो जाता है—अर्थात उसका स्वरूप ही परमानन्द बन जाता है। यह आनन्द किसी बाहरी वस्तु से नहीं मिलता, न यह मन की उत्तेजना या सुख की कोई लहर है; बल्कि यह आत्मा की अपनी सहज, शाश्वत, निर्बाध अनुभूति है। जब मन की सभी वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं और साधक अपने स्वप्रकाश स्वरूप में स्थित हो जाता है, तब वह आनंद का अनुभव नहीं करता—बल्कि स्वयं आनंदमय हो जाता है। इसलिए उसे न किसी वस्तु की आवश्यकता होती है, न किसी व्यक्ति पर आश्रय; उसका अस्तित्व ही पूर्णता का अनुभव देता है।
ज्ञानी पुरुष न बिभेति कश्चित्—किसी से भय नहीं करता। भय तभी उत्पन्न होता है जब हमें लगता है कि हम सीमित हैं, नश्वर हैं, बदलने वाले हैं, और बाहरी परिस्थितियाँ हमें प्रभावित कर सकती हैं। पर जब आत्मा को अजन्मा, अविनाशी, शाश्वत, निराकार, सर्वव्यापी, और अव्याहत प्रकाशस्वरूप जाना जाता है, तब भय का कोई कारण शेष नहीं रह जाता। शरीर को मृत्यु हो सकती है, मन को संकट हो सकते हैं, लेकिन वास्तविक आत्मा किसी का विषय नहीं है; वह कभी नष्ट नहीं होती। यह अनुभूति ही पूर्ण निडरता का आधार है।
अंतिम पंक्ति में शंकराचार्य विशेष रूप से मुमुक्षु—मुक्ति की तीव्र इच्छा रखने वाले साधक—को उपदेश देते हैं कि संसार के बंधनों से मुक्त होने का और कोई मार्ग नहीं है, सिवाय आत्मतत्त्व के साक्षात्कार के। दर्जनों कर्म, दान, व्रत, तप, पूजा, कर्मकांड या केवल शास्त्राध्ययन मुक्ति नहीं दे सकते, यदि आत्मज्ञान नहीं हुआ है। कर्म, उपासना और शास्त्र—ये सब मन को शुद्ध करने, स्थिर करने और तैयार करने के साधन हैं; परंतु अंतिम मुक्ति तो तभी संभव है जब अज्ञान का नाश हो, और अज्ञान का नाश केवल ज्ञान से होता है। जैसे अंधकार का अंत केवल प्रकाश से होता है, उसी प्रकार अविद्या का अंत केवल आत्मज्ञान से होता है।
इसलिए यह श्लोक मुमुक्षु के लिए स्पष्ट आह्वान है कि वास्तविक मार्ग केवल ज्ञान है—सीधे-सपाट, निर्विवाद, अद्वितीय। जो अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वही शोक से मुक्त, भय से रहित और आनन्दघन हो जाता है। यही अद्वैत वेदांत का सबसे गहन और अंतिम निष्कर्ष है।
!! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !!