"विवेकचूडामणि ग्रंथ का 225वां श्लोक"
ॐ !! वंदे गुरु परंपराम् !! ॐ
"आत्मस्वरूप-निरूपण"
"श्रीगुरुरुवाच"
ब्रह्माभिन्नत्वविज्ञानं भवमोक्षस्य कारणम् । येनाद्वितीयमानन्दं ब्रह्म सम्पद्यते बुधैः ॥ २२५ ॥
अर्थ:-ब्रह्म और आत्मा के अभेद का ज्ञान ही भवबन्धन से मुक्त होने का कारण है, जिसके द्वारा बुद्धिमान् पुरुष अद्वितीय आनन्दस्वरूप ब्रह्मपद को प्राप्त कर लेता है।
विवेकचूडामणि का यह श्लोक अद्वैत वेदांत के सार तत्व को अत्यंत सरल, स्पष्ट और गूढ़ रूप में प्रस्तुत करता है। शंकराचार्य यहाँ यह बताते हैं कि संसार रूपी बन्धन से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है—ब्रह्म और आत्मा की अभिन्नता का प्रत्यक्ष, अनुभूत ज्ञान। मनुष्य जन्म, मरण, सुख, दुःख, इच्छाएँ, भय, आसक्तियाँ और कर्मों के फलों में इसलिए बँधा रहता है क्योंकि वह अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता। अज्ञान से उत्पन्न यह भ्रांति ही जीव को सीमित, अपूर्ण, अल्पज्ञ और दुखी मानने पर मजबूर करती है। परन्तु जब यह ज्ञान उदय होता है कि मैं यह शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार या अनुभवों का संग्रह नहीं हूँ—अपितु इन सबका साक्षी, अपरिवर्तनशील, नित्य, शुद्ध चैतन्य हूँ—तब सारे बंधन स्वतः मिट जाते हैं। इसी अनुभूति को इस श्लोक में 'ब्रह्माभिन्नत्व-विज्ञान' कहा गया है।
यह ज्ञान केवल बुद्धि का विचार मात्र नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव की स्थिति है जिसमें ज्ञाता और ज्ञान एक हो जाते हैं। उपनिषद् भी घोषित करते हैं—“अहं ब्रह्मास्मि”, “तत्त्वमसि”, “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”—अर्थात् आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं। यह भेद केवल अविद्या, मायिक उपाधियों और अहंकार के कारण प्रतीत होता है। जब साधक विवेक, वैराग्य, शम, दम, ध्यान, शुद्ध आचरण और गुरु-शास्त्र की सहायता से इन उपाधियों का निरसन करता है, तो वह जानता है कि जो चेतना उसके भीतर ‘मैं-मैं’ के रूप में सदा प्रकाशित है, वही चेतना सम्पूर्ण जगत की भी मूल सत्ता है। यह जानना ही केवल ज्ञान नहीं, बल्कि मुक्ति का सच्चा कारण है।
श्लोक में कहा गया है—“ब्रह्माभिन्नत्वविज्ञानं भवमोक्षस्य कारणम्”—अर्थात् जन्म-मरण के चक्र से छूटने का एकमात्र कारण यही ’अभेद-ज्ञान’ है। कर्म, पूजा, यज्ञ, तप, तीर्थ, व्रत आदि सभी साधन मन को शुद्ध करने के लिए आवश्यक हैं, परंतु वे अंतिम मुक्ति देने में सक्षम नहीं। मुक्ति केवल ज्ञान से मिलती है, क्योंकि बन्धन अज्ञान से उत्पन्न है। जिस प्रकार अंधकार को मिटाने के लिए प्रकाश ही पर्याप्त है, उसी प्रकार अविद्या—जो “मैं शरीर हूँ”, “मैं कर्ता हूँ”, “मैं भोगता हूँ”—इन भ्रांतियों का समूह है—उसे मिटाने के लिए आत्म-ब्रह्म का ज्ञान ही आवश्यक है।
श्लोक कहता है कि इस ज्ञान से बुद्धिमान व्यक्ति अद्वितीय आनन्दस्वरूप ब्रह्म को प्राप्त करता है। यहाँ “प्राप्ति” शब्द भी वास्तविक अर्थ में प्राप्ति नहीं, बल्कि अपने स्वभाव की पहचान है, क्योंकि ब्रह्म सदैव हमारा स्वभाव ही है, कभी दूर नहीं था। जैसे व्यक्ति स्वप्न में अपने आप को दुखी, असहाय, भयभीत अनुभव करता है, और जागने पर पाता है कि वह स्वप्न मात्र भ्रम था—वैसे ही आत्मज्ञान होने पर जीव पाता है कि वह कभी बँधा हुआ था ही नहीं।
यह अद्वितीय आनन्द कोई बाहरी अनुभव नहीं, न इन्द्रियों से मिलने वाली सुखानुभूति है। यह नित्य, अव्यय और स्वयं में पूर्ण शान्ति और आनन्द है—जो ब्रह्म का स्वभाव है। साधक जब ब्रह्म के साथ अपनी एकता को जानता है, तब उसके भीतर का शोक, भय, राग, द्वेष, असुरक्षा, कमी—सब नष्ट हो जाते हैं। वह जानता है कि एक ही चेतना सबमें व्याप्त है, और वही चेतना मैं हूँ। यही स्थिति जीवन्मुक्ति है।
इस प्रकार यह श्लोक स्पष्ट करता है कि संसार से मुक्ति का अंतिम और निर्णायक साधन केवल एक है—आत्मा और ब्रह्म की अभिन्नता का अनुभूत ज्ञान। जिसने यह जान लिया, वह उसी क्षण मुक्त हो जाता है और अद्वितीय, अविनाशी, अनन्त आनन्दस्वरूप ब्रह्म की अवस्था को प्राप्त करता है।
!! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !!