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शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

"विवेकचूडामणि ग्रंथ का 226वां श्लोक"


"विवेकचूडामणि ग्रंथ का 226वां श्लोक"

ॐ  !! वंदे  गुरु परंपराम् !! ॐ

"आत्मस्वरूप-निरूपण"

"श्रीगुरुरुवाच"

ब्रह्मभूतस्तु संसृत्यै विद्वान्नावर्तते पुनः ।

विज्ञातव्यमतः  सम्यग्ब्रह्माभिन्नत्वमात्मनः ॥ २२६ ॥

अर्थ:-ब्रह्मभूत हो जाने पर विद्वान् फिर जन्म-मरणरूप संसारचक्र में नहीं पड़ता; इसलिये आत्मा का ब्रह्म से अभिन्नत्व भली प्रकार जान लेना चाहिये।

विवेकचूडामणि का यह श्लोक आत्मज्ञान की चरम अवस्था और उसके फल को अत्यन्त स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करता है। शास्त्र कहता है कि जब ज्ञानी “ब्रह्मभूत” हो जाता है—अर्थात् जब वह यह प्रत्यक्ष अनुभूति कर लेता है कि उसका निजी ‘मैं’ कोई सीमित देह-मन का पात्र नहीं है, बल्कि वही निरन्तर, शुद्ध, अद्वितीय ब्रह्म है—तब उसके लिए पुनर्जन्म का कोई कारण ही नहीं बचता। संसार का चक्र केवल उसी को बांधता है जो अपने को देह, इन्द्रियों, मन और अहंकार के साथ तादात्म्य कर लेता है; किन्तु जो समझ लेता है कि ये सब मिथ्या, अनित्य और उपाधिजन्य हैं तथा वास्तविक सत्य केवल ब्रह्मस्वरूप आत्मा ही है, उसके बन्धन स्वतः समाप्त हो जाते हैं। इसीलिए शंकराचार्य कहते हैं कि ब्रह्म से आत्मा का अभेद—अर्थात् ‘मैं और ब्रह्म एक ही हूँ’—इस सत्य का सम्यक् ज्ञान होना अनिवार्य है।

यह श्लोक बताता है कि जन्म-मरण का चक्र वास्तव में अज्ञान की उपज है। जब तक जीव अपने को कर्ता, भोक्ता और अनुभवकर्ता मानता रहता है, तब तक उसके कर्म, इच्छाएँ और वासनाएँ उसे नए-नए जन्मों में धकेलती रहती हैं। मनुष्य सोचता है कि वह कर्म करता है, भोगता है, और जीवन के सुख-दुःख का कारण वह स्वयं है; किन्तु वेदान्त कहता है कि यह कर्तृत्व-भाव ही बन्धन की जड़ है। ब्रह्माभिन्नत्वबोध होने पर यह कर्तापन स्वयं ही गल जाता है। जैसे जागने पर स्वप्न का भय, सुख या दुःख बिना किसी प्रयत्न के स्वतः नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार ब्रह्मस्वरूप का प्रत्यक्ष ज्ञान मिलते ही संसार-बन्धन का मूल नष्ट हो जाता है। तब ज्ञानी के लिए संसार न तो कोई बन्धन बन पाता है और न ही कोई आकांक्षा उसे पुनर्जन्म की ओर खींच पाती है।

‘ब्रह्मभूत’ होने का अर्थ यह नहीं कि कोई व्यक्ति किसी दूर स्थान पर जाकर ब्रह्म बन जाता है। इसका अर्थ है कि वह यह समझ लेता है कि वह सदा से ही ब्रह्म था—अपरिचित, अविद्या से आवृत्त। जैसे बादल हटने पर सूर्य नया पैदा नहीं होता, बल्कि पूर्ववत् दीप्त होता है, वैसे ही आत्मा का ब्रह्म से अभेद ज्ञान में प्रकट होता है, न कि किसी नयी अवस्था के उत्पन्न होने से। यह अनुभव शास्त्र, गुरु और उपनिषदों द्वारा दिखाए गए मार्ग—श्रवण, मनन और निदिध्यासन—से दृढ़ होता है। जब वस्तुस्थिति स्पष्ट हो जाती है, तब जीवभाव की भ्रान्ति मिट जाती है और शुद्ध ब्रह्मभाव स्वयंसिद्ध रूप में प्रकाशमान हो जाता है।

सम्पूर्ण वेदान्त का निष्कर्ष भी यही है कि बन्धन वास्तविक नहीं है—वह केवल अज्ञान का परिणाम है। आत्मा कभी बंधा हुआ था ही नहीं, क्योंकि वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त सत्ता है। परन्तु जब तक यह सत्य अनुभव नहीं हो जाता, तब तक जीव संसार की गति को सत्य मानकर अनवरत जन्म-मरण में घूमता रहता है। अतः शंकराचार्य कहते हैं कि, “अतः सम्यक् ब्रह्माभिन्नत्वम् आत्मनः विज्ञातव्यम्”—अर्थात् आत्मा और ब्रह्म के अभेद का पूर्ण, अटल, स्पष्ट ज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है। कोई भी कर्म, उपासना या बाहरी साधन अन्ततः तभी फलित होता है जब वह साधक को इस अद्वैत-बोध की ओर ले जाए।

इस प्रकार यह श्लोक साधक को स्मरण दिलाता है कि मुक्ति कहीं बाहर नहीं, न भविष्य में है; वह तो यहीं, इसी क्षण उपलब्ध है, केवल आत्मस्वरूप की पहचान के अभाव से ढँकी हुई है। जैसे ही यह ज्ञान दृढ़ होता है कि “मैं ब्रह्म हूँ—शुद्ध चैतन्य, अनन्त, अविकार, और सबका आधार”—उसी क्षण भवचक्र समाप्त हो जाता है। यही अद्वैत का परम निश्चय और विवेकचूडामणि का सार है।

!! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !! 

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