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शनिवार, 10 जनवरी 2026

"विवेकचूडामणि ग्रंथ का 227वां श्लोक"


"विवेकचूडामणि ग्रंथ का 227वां श्लोक"

ॐ  !! वंदे  गुरु परंपराम् !! ॐ

"आत्मस्वरूप-निरूपण"

"श्रीगुरुरुवाच"

सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म विशुद्धं परं स्वतःसिद्धम् ।
नित्यानन्दैकरसं प्रत्यगभिन्नं निरन्तरं जयति ॥ २२७॥

अर्थ:-ब्रह्म सत्य ज्ञान स्वरूप और अनन्त है; वह शुद्ध, पर, स्वतःसिद्ध, नित्य, एक मात्र आनन्द रस स्वरूप, प्रत्यक् (अन्तरतम) और अभिन्न है, तथा निरन्तर उन्नतिशाली है।

विवेकचूडामणि का यह श्लोक ब्रह्मस्वरूप की परम व्याख्या प्रस्तुत करता है। शंकराचार्य यहाँ साधक को यह स्पष्ट कराते हैं कि जिस सत्य की खोज में वह लगा है, वह कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि स्वयं उसकी ही अन्तःस्थित, शुद्ध, अनन्त और नित्य अनुभूति है। ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ उपनिषदों का महावाक्य है, जिसमें ब्रह्म के तीन मूल लक्षण बताए जाते हैं—सत्य, ज्ञान और अनन्तत्व। ‘सत्य’ का अर्थ यहाँ यह नहीं कि ब्रह्म मात्र किसी वस्तु की तरह विद्यमान है; सत्य का अर्थ है—जिसका अस्तित्व तीनों कालों में अटल हो। संसार की सभी वस्तुएँ परिवर्तनशील हैं, उनका अस्तित्व कारण-कार्य संबंधों पर आधारित है; परन्तु ब्रह्म ऐसा तत्व है जिसका अस्तित्व किसी अन्य कारण पर निर्भर नहीं है। वह स्वतः सिद्ध है—अर्थात् उसे सिद्ध करने के लिए किसी प्रमाण, तर्क या अनुभव की अपेक्षा नहीं पड़ती। जैसे सूर्य को दिखाने के लिए दीपक की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही ब्रह्मस्वरूप को सिद्ध करने के लिए भी किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं; वह स्वयं ही अपने अस्तित्व का प्रकाश है।

‘ज्ञानम्’ का अर्थ है—चैतन्य, प्रकाश, वह सत्ता जो सबको जानने वाली है। यह ज्ञान कोई सीमित बुद्धि का ज्ञान नहीं, बल्कि वह शाश्वत सत्ता है जिसके कारण बुद्धि भी प्रकाशित होती है। मन, बुद्धि, अहंकार सभी जड़ प्रकृति के अंग हैं; वे प्रकाशमान तभी प्रतीत होते हैं जब चैतन्य का प्रतिबिम्ब उनमें पड़े। यह चैतन्य ही ब्रह्म है—स्वयंप्रकाश, स्वयं ज्योति, जिसे किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं।

‘अनन्तम्’ का अर्थ है—जिसमें कोई सीमा, विभाजन या परिमाण नहीं। ब्रह्म का न कोई आरम्भ है, न अंत, न ही वह देश, काल या वस्तु द्वारा सीमित है। जो सीमित होता है, वह नश्वर होता है। अनन्त का अर्थ यहाँ केवल विशालता नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सीमाओं का अभाव है—देशाध्यस्त सीमाएँ नहीं, कालाध्यस्त परिवर्तन नहीं, वस्त्वध्यस्त भेद नहीं।

श्लोक आगे कहता है कि ब्रह्म ‘विशुद्धं’ है—अर्थात् उपाधियों से रहित, प्रकृति के गुणों से परे। शुद्ध का अर्थ पवित्र नहीं, बल्कि निरुपाधिक, निरवच्छिन्न चैतन्य। यह ‘परम्’ है—सबसे ऊपर, सबका आधार। सभी अनुभव, विचार, क्रियाएँ जिस सत्ता पर टिके हैं, वही परम् ब्रह्म है। ‘स्वतःसिद्धम्’ यह पुनः स्मरण कराता है कि ब्रह्म स्वयं अपने-आप में सिद्ध है; आत्मा को देख पाने के लिए कोई विशेष साधन बाहरी रूप में आवश्यक नहीं, बल्कि अज्ञान का निवारण ही पर्याप्त है।

‘नित्यानन्दैकरसं’ से आशय है कि ब्रह्म न केवल चैतन्य है, बल्कि आनन्दरूप भी है। यह आनंद इन्द्रियानुभव से प्राप्त सुख नहीं; यह आत्मस्वरूप का सहज, अविच्छिन्न, अपरिवर्तनीय आनन्द है। यह आनन्द किसी कारण पर निर्भर नहीं होता, न किसी वस्तु के प्राप्ति-अप्राप्ति से प्रभावित। ब्रह्म चैतन्य का स्वभाव ही आनन्द है, जैसे सूर्य का स्वभाव प्रकाश है।

‘प्रत्यगभिन्नम्’ का अर्थ है—यह ब्रह्म कोई दूर स्थित सत्ता नहीं, बल्कि अपने ही हृदय में, अपने ही अस्तित्व में अभिन्न रूप से स्थित है। ‘प्रत्यग’ का अर्थ भीतर, अन्तरतम; और ‘अभिन्न’ का अर्थ है कि जीव और ब्रह्म में किसी प्रकार का वास्तविक भेद नहीं। जो भेद दिखाई देता है वह केवल उपाधि के कारण है—देह, मन, बुद्धि, अहंकार आदि की सीमाएँ।

अन्त में ‘निरन्तरं जयति’ यह संकेत देता है कि यह ब्रह्म सदा विजयी, सदा उद्भासित, सदा व्याप्त है। उसकी सत्ता में कभी क्षय या परिवर्तन नहीं। साधक जब अपने मन की अशुद्धियों, अविद्या और अहंकार को मिटा देता है, तब यही निरन्तर विजयी ब्रह्म उसके अनुभव में प्रकट हो जाता है, जो नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है। यह अनुभव ही मोक्ष है।


!! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !! 

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