अपारसंसारसमुद्रमध्ये सम्मज्जतो मे शरणं किमस्ति । गुरो कृपालो कृपया वदैत-द्विश्वेशपादाम्बुजदीर्घनौका ।१।
प्रश्न:-हे दयामय गुरुदेव ! कृपा | करके यह बताइये कि अपार संसार रूपी समुद्र-में मुझ डूबते हुए का आश्रय क्या है ?
उत्तर:-विश्वपति परमात्मा के चरण कमल रूपी जहाज।
व्याख्या:-यह श्लोक शंकराचार्य द्वारा रचित प्रश्नोत्तर शैली की अत्यंत करुणापूर्ण व गूढ़ शिक्षाओं में से है, जिसमें शिष्य अपने गहरे असहाय भाव को व्यक्त करते हुए गुरु से जीवन-मरण के संकट में सच्चे आश्रय का प्रश्न करता है। संसार को यहाँ “अपार समुद्र” कहा गया है—अर्थात् ऐसा समुद्र जिसका कोई किनारा दिखाई नहीं देता। जन्म, मृत्यु, रोग, शोक, क्लेश, वासनाएँ, इच्छाएँ और भय—ये सब उस समुद्र की लहरें हैं जो साधक को निरंतर नीचे खींचती रहती हैं। शिष्य कहता है कि मैं इस संसार-सागर में डूब रहा हूँ, मेरी अपनी सामर्थ्य समाप्त हो चुकी है, मेरे सारे प्रयास व्यर्थ हो गए हैं; अब मैं आप ही से पूछ रहा हूँ कि मेरा वास्तविक शरण क्या है? यह भाव साधना की पराकाष्ठा है, जहाँ अहंकार गल जाता है और जीव अपनी पूर्ण दीनता व विवेक के साथ गुरु की शरण में आता है।
गुरु का उत्तर अत्यंत मार्मिक है—“विश्वेश-पादाम्बुज-दीर्घ-नौका”, अर्थात् संसार के स्वामी परमात्मा के चरण-कमल ही उस लंबी नौका के समान हैं जो साधक को इस अपार महासागर से पार उतार सकती है। यहाँ “दीर्घ नौका” शब्द गहरे अर्थ से भरा है। यह नौका साधारण साधनों की तरह डगमगाने वाली नहीं है; यह स्थिर है, अचल है, और अनादि काल से असंख्य जीवों को भव-सागर से पार कराती आई है। इस नौका का आधार किसी बाहरी वस्तु या परिवर्तनशील शक्ति पर नहीं, बल्कि स्वयं सत्यस्वरूप परमात्मा पर है। शंकराचार्य यह बताना चाहते हैं कि संसार के झंझावातों से पार पाने के लिए कोई लौकिक उपाय स्थायी नहीं हो सकता, क्योंकि संसार स्वयं परिवर्तनशील है, परन्तु परमात्मा—जो विश्वपति हैं—नित्य, शाश्वत और अचल हैं। उनके चरण-कमल में शरण लेना ही वास्तविक सुरक्षा है।
परमात्मा के चरण यहाँ केवल किसी देहधारी भगवान के चरण नहीं हैं; वे सत्य, ज्ञान और आनन्द रूप ब्रह्म के प्रतीक हैं। उनके चरणों का अर्थ है—वैराग्य, भक्तिभाव, समर्पण और आत्म-ज्ञान की ओर प्रवृत्ति। जब साधक अपने अहंकार को छोड़कर, अपनी सीमाओं को स्वीकार कर, उस परमसत्य की ओर मुख करता है, तभी वह नौका उसके जीवन में प्रविष्ट होती है। गुरु स्वयं उस नौका के मार्गदर्शक हैं—वे साधक को दिशा देते हैं, विवेक प्रदान करते हैं, और उसे उस परम आश्रय की ओर ले जाते हैं जिसे वह स्वयं भूल चुका होता है।
इस उत्तर में शंकराचार्य यह भी संकेत करते हैं कि संसार-सागर से पार होना केवल बौद्धिक तर्क से, या केवल कर्मों के सहारे संभव नहीं है। इसके लिए परम आश्रय की आवश्यकता है, और वह आश्रय परमात्मा के चरण हैं जो अनुग्रह के बिना उपलब्ध नहीं होते। शिष्य ने पहले ही अपनी विनम्रता में “कृपालो गुरो” कहा है—जब गुरु कृपा करते हैं, तब ही साधक को वास्तविक शरण की पहचान होती है। गुरु की कृपा और साधक की विनम्रता मिलकर ही परमात्मा की नौका से उसे जोड़ती है।
अंततः यह श्लोक हमें यह सीख देता है कि संसार के संघर्षों में जब मनुष्य थककर चूर हो जाता है और उसे कोई मार्ग न दिखाई दे, तब वास्तविक समाधान किसी बाहरी साधन में नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व के आधार—परमात्मा के चरण—में मिलता है। वही शरण है, वही पथ है, और वही वह नौका है जो जीवन के सभी तूफानों के पार ले जाकर शांति के तट पर पहुँचा देती है।