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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

आदि शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी (मणिरलमाला) का दूसरा श्लोक

बद्धो हि को यो विषयानुरागी का वा विमुक्तिर्विषये विरक्तिः । 

को वास्ति घोरो नरकः स्वदेह-स्तृष्णाक्षयः स्वर्गपदं किमस्ति । २।

प्रश्न:-वास्तवमें बँधा कौन है ? |
विमुक्ति क्या है ?
घोर नरक क्या है?
स्वर्गका पद क्या है ? |

उत्तर:- जो विषयों में आसक्त है।
विषयों से वैराग्य।
अपना शरीर।
तृष्णा का नाश होना।

व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा रचित यह प्रश्नोत्तरी अत्यन्त सरल किन्तु अद्वैत वेदान्त के गूढ़ सिद्धान्तों को स्पष्ट करने वाली है। इसमें चार मुख्य प्रश्न उठाए गए हैं—बद्ध कौन है, मुक्ति क्या है, घोर नरक क्या है और स्वर्गपद क्या है। ये चारों प्रश्न साधक के अंतःकरण को झकझोरते हैं और उसे अपने जीवन, अपने आचरण तथा अपनी आसक्ति-वैराग्य की स्थिति को देखने के लिए प्रेरित करते हैं। श्लोक कहता है कि बँधा वही है जो विषयों में आसक्त है; मुक्ति वही है जिसमें विषयों से वैराग्य उत्पन्न हो; घोर नरक यही शरीर है और स्वर्गपद तृष्णा का क्षय है। यह उत्तर सुनने में सरल प्रतीत होते हैं परन्तु इनके पीछे अत्यन्त गहन आत्मदर्शन छिपा हुआ है।

शंकराचार्य कहते हैं कि "बद्धो हि को?—जो विषयानुरागी", अर्थात् जो इन्द्रिय-विषयों में आसक्त है, वही वास्तविक रूप में बँधा है। बंधन किसी बाहरी शक्ति द्वारा लगाया हुआ कोई बंधन नहीं है; यह मन की अपनी प्रवृत्ति है। रसों, रूपों, ध्वनियों, स्पर्श और स्वाद के प्रति निरन्तर आकर्षण ही मनुष्य को संसार में बाँधता है। जब मन किसी वस्तु या व्यक्ति से आसक्त हो जाता है, तब वह उसी की ओर दौड़ता है, उसी में सुख खोजता है और उसके बिना दुखी हो जाता है। यही निर्भरता ‘बंधन’ है। शंकराचार्य के अनुसार संसार कोई बाहरी कारागार नहीं है; मन का विषयों की ओर दौड़ना ही उसका कारावास है। जिस क्षण मन विषयों से मुक्त हो जाता है, उसी क्षण बंधन टूट जाता है, चाहे शरीर संसार में ही रहता हो।

दूसरा प्रश्न है—विमुक्ति क्या है? उत्तर है—“विषये विरक्तिः”, अर्थात् विषयों से वैराग्य ही मुक्ति है। वैराग्य का अर्थ विषयों का दमन नहीं, बल्कि विषयों के पीछे छिपी क्षणिकता और नश्वरता को समझकर उनसे स्वतः निर्विकार हो जाना है। जब साधक यह जान लेता है कि इन्द्रिय-विषय स्थायी सुख नहीं दे सकते, तो उनसे स्वभावत: एक दूरी उत्पन्न होती है। यह दूरी किसी दबाव से नहीं, बल्कि ज्ञान से आती है। वैराग्य वही है जो विवेक से उत्पन्न होता है—नित्य और अनित्य का भेद समझकर अनित्य को छोड़ने की सहज प्रवृत्ति। जैसे कोई व्यक्ति खेल-खेल में मिट्टी के खिलौनों से प्रेम करता है पर बड़ा होते ही जान जाता है कि वे वास्तविक मूल्य के नहीं हैं—उसी प्रकार विषयों के प्रति उदासीनता ही वास्तविक मुक्ति है।

तीसरा प्रश्न है—घोर नरक क्या है? उत्तर दिया है—“स्वदेहः”, अर्थात् यह शरीर ही घोर नरक है। इसका अभिप्राय यह नहीं कि शरीर स्वयं में दोष है, बल्कि यह कि शरीर से निरन्तर चिपकी हुई अहंता, ममता, रोग, वृद्धावस्था, दुख और असंख्य प्रकार के कष्ट मनुष्य के लिए नरक समान हैं। शरीर के साथ ही अनगिनत आवश्यकताएं, भय और चिंताएं जुड़ी हुई हैं—भूख, प्यास, बीमारी, असुरक्षा, अपमान का भय, मृत्यु का भय। शरीर को ‘मैं’ मान लेना ही सबसे बड़ा भ्रम है और इसी कारण शरीर को रक्षक समझने वाला मनुष्य उसी के कारण दुखी होता है। शंकराचार्य यह इंगित करते हैं कि शरीर-भाव ही दुखों का स्रोत है, क्योंकि आत्मा शरीर नहीं है, पर जब आत्मा स्वयं को शरीर मान लेती है, तब संसार के सभी क्लेश उसका अनुभव बन जाते हैं।

अंतिम प्रश्न है—स्वर्गपद क्या है? उत्तर है—“तृष्णाक्षयः”, अर्थात् तृष्णा का नाश ही स्वर्ग है। स्वर्ग कोई दूर कहीं स्थित स्थान नहीं है, बल्कि मन की वह अवस्था है जहाँ इच्छाएँ समाप्त हो जाती हैं। इच्छा का स्वभाव ही असंतोष है—एक इच्छा पूरी हुई तो दूसरी उत्पन्न होती है। तृष्णा मन को निरंतर अशांत रखती है। जिस क्षण इच्छाएँ शान्त होती हैं, उसी क्षण मन में एक अद्भुत शांति उतर आती है। यही भीतर का स्वर्ग है। जिस मन में तृष्णा, तुलना, लालसा और आकांक्षा नहीं रहती, वही मन आनंद का आकाश बन जाता है। तृष्णा का क्षय ज्ञान से आता है—जब साधक देखता है कि बाहरी वस्तुएँ क्षणिक हैं और आत्मा पूर्ण है।

इस प्रकार यह श्लोक साधना का सार प्रस्तुत करता है—बंधन विषयासक्ति में है, मुक्ति वैराग्य में है, नरक शरीराभिमान में है और स्वर्ग तृष्णा के नाश में है। जो साधक इसे हृदय से समझ लेता है, उसके लिए आत्मसाक्षात्कार का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है।