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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

आदि शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी (मणिरलमाला) का तीसरा श्लोक

संसारहृत्कः श्रुतिजात्मबोधः को मोक्षहेतुः कथितः स एव ।

द्वारं किमेकं नरकस्य नारी का स्वर्गदा प्राणभृतामहिंसा । ३।

प्रश्न:-संसार को हरनेवाला कौन है?
मोक्ष का कारण क्या कहा गया है ?
नरक का प्रधान द्वार क्या है?
स्वर्ग को देने वाली क्या है ?

उत्तर:-वेद से उत्पन्न आत्मज्ञान ।
वही आत्मज्ञान ।
नारी।
जीव मात्र की अहिंसा ।

व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा प्रस्तुत यह प्रश्नोत्तरी श्लोक मानव जीवन के चार अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्नों को उठाती है—संसार से मुक्ति का उपाय क्या है, मोक्ष का कारण क्या है, नरक का द्वार क्या है, और स्वर्ग प्रदान करने वाला क्या है। इन सरल प्रतीत होने वाले प्रश्नों में अत्यंत गहन आध्यात्मिक सन्देश निहित है। श्लोक कहता है कि संसार को हराने वाला ‘श्रुति-जन्म आत्मबोध’ है—अर्थात् उपनिषदों से प्राप्त होने वाला आत्मज्ञान। संसार कोई बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि अज्ञान से उत्पन्न एक अनुभव है। जब तक मनुष्य स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि या इन्द्रियों से ही सीमित मानता है, तब तक उसे जन्म-मरण, सुख-दुःख, मोह-माया, राग-द्वेष—इन सबका चक्र समाप्त नहीं होता। परंतु जैसे ही उसे वेद-वाक्यों के द्वारा यह ज्ञात होता है कि वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त आत्मा है, जो कभी जन्म नहीं लेती और न कभी मरती है—उसी क्षण संसार रूपी बन्धन ढह जाता है। इसीलिए शंकराचार्य स्पष्ट रूप में कहते हैं कि संसार को परास्त करने वाला केवल और केवल आत्मज्ञान ही है।

दूसरा प्रश्न आता है—मोक्ष का कारण क्या है? उत्तर फिर वही है—आत्मज्ञान। मोक्ष कोई अलग उपलब्धि नहीं, न कोई स्थान है जहाँ पहुँचना है। मोक्ष का अर्थ है—अपने वास्तविक स्वरूप का प्रत्यक्ष ज्ञान। अज्ञान की समाप्ति ही मोक्ष है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश होते ही अन्धकार स्वयं मिट जाता है, उसी प्रकार आत्मज्ञान होते ही जन्म-मरण, पाप-पुण्य, कर्म-बन्धन, भय, दुःख—ये सब अपने-आप समाप्त हो जाते हैं। इसलिए शंकराचार्य जोर देकर कहते हैं कि आत्मज्ञान ही मोक्ष का एकमात्र कारण है; यज्ञ, व्रत, दान, तप, तीर्थ—ये किसी भी प्रकार जन्म-मरण के मूल कारण को समाप्त नहीं कर सकते जब तक आत्मा का सत्य स्वरूप ज्ञात न हो। मोक्ष कोई क्रिया का फल नहीं, बल्कि ज्ञान का उदय है।

तीसरा प्रश्न—नरक का द्वार क्या है? उत्तर है—नारी। यह कथन अक्सर गलत समझ लिया जाता है। यहाँ ‘नारी’ किसी स्त्री-विरोध का प्रतीक नहीं है, बल्कि 'भोग की प्रवृत्ति' का द्योतक है। ‘नारी’ शब्द यहाँ विषय-भोग, वासना, मोह और इन्द्रियासक्ति का प्रतीक है। स्त्री एक व्यक्ति नहीं, बल्कि आकर्षण का रूपक है, जो मनुष्य को संसार में बांधता है। जब मन बाह्य आकर्षणों में डूबा रहता है, तब विवेक नष्ट हो जाता है और जीवन पाप, भ्रम, दुख और बन्धन की ओर खिंच जाता है। इसलिए शंकराचार्य इस शब्द का प्रयोग चेतावनी देने के रूप में करते हैं कि इन्द्रियासक्ति ही नरक का मुख्य कारण है।

चौथा प्रश्न—स्वर्ग प्रदान करने वाली क्या है? उत्तर—अहिंसा। जीव मात्र की अहिंसा का अर्थ है—केवल हिंसा न करना ही नहीं, बल्कि किसी भी जीव के प्रति करुणा, सद्भाव, प्रेम और सहानुभूति रखना। अहिंसा वह गुण है जो मनुष्य के हृदय को शुद्ध करता है, विचारों को पवित्र करता है, और व्यक्ति को देवत्व की ओर ले जाता है। जब मनुष्य अपने व्यवहार में दया और करुणा को स्थान देता है, तब उसका मन देवतुल्य बन जाता है, और वही स्वर्ग का वास्तविक द्वार है। स्वर्ग कहीं बाहर नहीं है; एक निर्मल और अहिंसक हृदय ही स्वर्ग का अनुभव कराता है।

इस प्रकार इस श्लोक में संसार से मुक्ति, मोक्ष का साधन, नरक का कारण और स्वर्ग की प्राप्ति—इन सभी का अत्यंत संतुलित, गहन और सारगर्भित विवेचन मिलता है, जो साधक को सही दिशा में प्रेरित करता है।