विज्ञान्महाविज्ञतमोऽस्ति को वा नार्या पिशाच्या न च वञ्चितो यः ।
का शृङ्खला प्राणभृतां हि नारी दिव्यं व्रतं किं च समस्तदैन्यम् । १५ ।
प्रश्न:-समझदारों में सबसे अच्छा समझदार कौन है ?
प्राणियों के लिये साँकल क्या है ?
श्रेष्ठ व्रत क्या है ?
उत्तर:-जो स्त्रीरूप पिशाचिनी से नहीं ठगा गया है।
नारी ही।
पूर्णरूप से विनयभाव।
व्याख्या:-शंकराचार्य की इस प्राश्नोत्तरी में जीवन, संसार और आध्यात्मिक पुरुषार्थ से जुड़े गहन सत्य अत्यंत सरल किंतु प्रभावशाली उदाहरणों के माध्यम से प्रकट किए गए हैं। यहाँ “विज्ञान्महाविज्ञतम:” अर्थात् समझदारों में सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमान वही व्यक्ति है जो स्त्रीरूप पिशाचिनी से—अर्थात् माया के मोहक रूप से—ठगा नहीं जाता। यह स्त्री किसी विशेष स्त्री का नहीं, बल्कि संसार की आकर्षक और भ्रमित करने वाली शक्तियों का प्रतीक है। शंकराचार्य बार-बार इस बात पर बल देते हैं कि मनुष्य का पतन बाहरी स्त्रियों से नहीं, बल्कि उसके मन में उठने वाले विषय-भोग के आकर्षण से होता है। जब मनुष्य इन आकर्षणों के पीछे भागता है, तब वह विवेक खो देता है; और जब वह विवेक खो देता है, तभी वास्तविक ठगा जाना शुरू होता है। अतः वह ज्ञानी, वह महाविज्ञानी है जो संसार की चकाचौंध, आकर्षणों, विषयों और इन्द्रिय-लोलुपताओं को पहचानकर उनसे अपने को बचा लेता है। यह व्यक्ति बाहरी कठिनाइयों से लड़कर बड़ा नहीं कहलाता, बल्कि अपने भीतर के आकर्षणों और वासनाओं से मुक्त होकर महाविज्ञानी कहलाता है।
इसके बाद श्लोक में कहा गया कि जीवों के लिए “शृंखला” क्या है। उत्तर है—नारी। यहाँ भी “नारी” किसी विशेष स्त्री का संकेत नहीं है, बल्कि संसार की वह मोहिनी शक्ति है जो मनुष्य को घर-गृहस्थी, भोग, संबंधों और मायिक सुखों में बाँध देती है। यह वही नारी है जिसका उल्लेख उपनिषदों में “अविद्या” और गीता में “मोह” के रूप में मिलता है। मनुष्य तब तक बंधनमुक्त नहीं हो सकता, जब तक वह इन बंधनों को पहचान न ले। शंकराचार्य का उद्देश्य नारी-विरोध नहीं, बल्कि अविद्या-विरोध है। जिस प्रकार लोहे की वास्तविक जंजीर मनुष्य को बाँधकर उसकी स्वतंत्रता छीन लेती है, उसी प्रकार संसार के आकर्षण—भले ही वे प्रेम, संबंध, सुख या मोह के रूप लें—जीव को अपनी आध्यात्मिक यात्रा से बाँध देते हैं। यह “शृंखला” बाहरी नहीं, बल्कि मानसिक है; इसकी जड़ें मन के भीतर हैं, और वही मन इसे तोड़ भी सकता है।
श्लोक का तीसरा प्रश्न है—श्रेष्ठ व्रत क्या है? उत्तर दिया गया—समस्त दैन्य अर्थात् पूर्ण विनयभाव। यहाँ “व्रत” का अर्थ उपवास या किसी बाहरी क्रिया से नहीं है। शंकराचार्य के अनुसार सच्चा व्रत वह है जो मनुष्य के अहंकार को गलाए। अहंकार ही वह दीवार है जो मनुष्य को परमात्मा से अलग रखती है। विनय, विनम्रता, दैन्य—ये वे गुण हैं जो आध्यात्मिक पथ के अनिवार्य साधन हैं। गीता में भी कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ज्ञान विनम्र, अहिंसक, क्षमाशील और अहंकाररहित मन में प्रकट होता है। जब मनुष्य में दर्प होता है, अपने ज्ञान, शक्ति, धन, सौंदर्य, परिवार या सामाजिक स्थिति का अभिमान होता है, तब उसका हृदय कठोर हो जाता है और उसके लिए सत्य का ग्रहण कठिन हो जाता है। विनम्रता वह दिव्य व्रत है जो मन को पवित्र करता है। यह व्रत निरंतर चलने वाला है—एक दिन का नहीं, जीवनभर का। विनयभाव आने पर मनुष्य सभी के प्रति करुणा, सम्मान और सरलता से व्यवहार करता है और उसका मन अहंकार-मुक्त हो जाता है।
इस प्रकार यह श्लोक हमें तीन गहरे सत्य सिखाता है—सच्चा ज्ञान वह है जो मोह से बचा ले; सच्चा बंधन मन के भीतर है, बाह्य नहीं; और सच्चा व्रत वह है जो अहंकार को गलाकर मनुष्य को परमात्मा के मार्ग पर दृढ़ कर दे।