कस्यास्ति नाशे मनसो हि मोक्षः क्व सर्वथा नास्ति भयं विमुक्तौ ।
शल्यं परं किं निजमूर्खतैव के के ह्युपास्या गुरुदेववृद्धाः । २३।
प्रश्न:-किसके नाश में मोक्ष है ?
किस में सर्वथा भय नहीं है?
सबसे अधिक चुभने-वाली कौन चीज है ?
उपासना के योग्य कौन-कौन हैं ?
उत्तर:-मन के ही।
मोक्ष में।
अपनी मूर्खता ही।
देवता, गुरु और वृद्ध ।
व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा प्रस्तुत यह प्रश्नोत्तरी आत्मचिन्तन, साधना और आध्यात्मिक प्रगति के अत्यन्त सूक्ष्म रहस्यों को सहज भाषा में उजागर करती है। इसमें बताया गया है कि मोक्ष का सार किसी बाहरी उपलब्धि में नहीं, बल्कि मन के पूर्ण नाश—अर्थात् मन की विकृतियों, वासनाओं, अहंकार और चंचलता के लय में है। जब मन अपनी अशुद्धियों से मुक्त होता है, तब मनुष्य अपने स्वस्वरूप, अर्थात् शुद्ध आत्मा का अनुभव करता है। यहाँ मन के नाश का अर्थ मन की पूर्ण समाप्ति नहीं, बल्कि उसके अशुभ संस्कारों, द्वैतबुद्धि, आसक्ति और कल्पनाओं का लोप है। जब मन शांत होता है, तब आत्मा का प्रकाश स्वयं प्रकाशित होता है और वही मोक्ष की अवस्था है।
इसके आगे कहा गया है कि भय पूर्णतया केवल एक ही अवस्था में समाप्त होता है—मोक्ष में। जब तक मनुष्य शरीर, मन और संसार को वास्तविक मानकर उनसे अपने को जोड़ता है, तब तक भय बना रहता है; कभी मृत्यु का भय, कभी भविष्य का भय, कभी हानि का भय, कभी अपयश का भय। किंतु जब आत्मा का साक्षात्कार होता है और ज्ञात होता है कि वास्तविक “मैं” न कभी जन्मा, न कभी मरता है, न किसी वस्तु का बंधन उसे छू सकता है—तब भय का कोई आधार ही नहीं बचता। मोक्ष का अर्थ ही है उस ज्ञान की अनुभूति जिसमें भय का पूर्ण लोप हो जाता है।
तीसरे प्रश्न का उत्तर अत्यन्त सूक्ष्म सत्य को प्रकट करता है—सबसे अधिक चुभने वाली चीज़ अपनी मूर्खता है। बाहर के कांटे, आलोचनाएँ, कटु वचन, हानि—ये सब समय के साथ दूर हो सकते हैं, परंतु अपनी अज्ञानता और मूर्खता का दंश भीतर ही भीतर मनुष्य को लगातार सताता रहता है। अपनी भूलें, अपनी कमजोरियाँ, अपनी अविवेकपूर्ण प्रवृत्तियाँ बार-बार जीवन में दुःख का कारण बनती हैं। इसीलिए आत्मविद्या का महत्व अत्यधिक है—क्योंकि वही हमें अपनी ही मूर्खताओं को पहचानने, सुधारने और अंततः उनसे मुक्त होने में सहायक होती है। मनुष्य को बड़ा शत्रु बाहर नहीं, बल्कि अपनी अज्ञानता के भीतर ही छिपा मिलता है।
अन्तिम प्रश्न में बताया गया है कि उपासना के योग्य कौन हैं—देवता, गुरु और वृद्धजन। देवता हमारी चेतना को उच्च बनाते हैं, हमारी श्रद्धा को स्थिर करते हैं और हमें दिव्यता की ओर ले जाते हैं। गुरु वह हैं जो अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश देते हैं; वे जीवन का वास्तविक मार्ग दिखाते हैं, इसलिए उनकी उपासना और सम्मान आध्यात्मिक प्रगति के मूल स्तम्भ हैं। वृद्धजन अनुभव के भंडार होते हैं; उनके जीवन-ज्ञान और सद्बुद्धि से समाज और परिवार सुरक्षित, सजग और संस्कारित होता है। अतः इन तीनों के प्रति श्रद्धा और सेवा ही मनुष्य को धर्म, सदाचार और मोक्ष के मार्ग पर दृढ़ करती है।
इस प्रकार यह श्लोक मानव जीवन का सार प्रस्तुत करता है—मन की शुद्धि ही मोक्ष का द्वार है, भय केवल ज्ञान से मिटता है, सबसे बड़ी पीड़ा अपनी अज्ञानता है, और जीवन की दिशा देवता, गुरु तथा वृद्धों की उपासना से ही निर्मल होती है।