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मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

आदि शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी (मणिरलमाला) का 24वा श्लोक

उपस्थिते प्राणहरे कृतान्ते किमाशु कार्य सुधिया प्रयत्नात्।

वाक्कायचित्तैः सुखदं यमघ्नं मुरारिपादाम्बुजचिन्तनं च। २४।

प्रश्न:-प्राण हरने वाले काल के उपस्थित होने पर अच्छी बुद्धि वालों को बड़े जतन से तुरंत क्या करना उचित है ?

उत्तर:-सुख देने वाले और मृत्यु का नाश करने वाले भगवान् मुरारि के चरण-कमलों का तन, मन, वचन से चिन्तन करना।

व्याख्या:-प्राणहरण करने वाले काल के साक्षात् उपस्थित होने पर मनुष्य की समस्त सामर्थ्य, विद्या, बल, सम्पन्नता और अहंकार एक ही क्षण में अर्थहीन हो जाते हैं। मृत्यु का सामना करते समय मनुष्य को यह स्पष्ट दिखाई देता है कि जगत् की कोई वस्तु उसके साथ नहीं जा सकती। इसी कारण शंकराचार्य यहाँ अत्यन्त गम्भीर संदेश देते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति के लिए उस क्षण सबसे आवश्यक क्या है। वे कहते हैं कि जब प्राण लेने वाला कृतान्त सामने खड़ा हो—अर्थात् जीवन का अन्त निकट हो—तब विचारशील मनुष्य को तन, मन और वचन से भगवान् मुरारि के चरणाम्बुज का स्मरण करना चाहिए। यह कोई मात्र धार्मिक कथन नहीं, बल्कि जीवन के सार का उपदेश है।

यह श्लोक हमें स्मरण कराता है कि मृत्यु के समय मनुष्य का वास्तविक सहारा न धन होता है, न परिवार, न शरीर और न मान–प्रतिष्ठा। उस समय केवल मन की स्थिति और उसकी दिशा ही साथ जाती है। यदि मन पूर्व से ही भगवान् के नाम, रूप और चरणों में स्थिर हो चुका है, तो अन्तिम समय में यह स्मरण स्वतः सहज हो जाता है। यह स्मरण केवल सांत्वना नहीं देता, बल्कि भय, मोह और असहायता को नष्ट करके भीतर गहरी शान्ति उत्पन्न करता है। इसलिए शंकराचार्य कहते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति को अन्त समय में नहीं, बल्कि जीवनभर इस अभ्यास को करना चाहिए—क्योंकि अन्तिम क्षणों में वही उदय होता है जिसका अभ्यास पूरे जीवन किया गया हो।

‘वाक्-काय-चित्तैः’ का विशेष उल्लेख अत्यन्त अर्थपूर्ण है। केवल मन में ही नहीं, वाणी से भी भगवान् का नाम लेना और शरीर से भी उनके अनुरूप कर्म करना आवश्यक है। यदि वाणी असत्य से भरी हो, कर्म पापपूर्ण हों और मन संसार में डूबा हो, तो अन्त समय में भगवत्स्मरण कठिन हो जाएगा। इसलिए शंकराचार्य कहते हैं कि मनुष्य को अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व—विचार, वाणी और कर्म—को भगवान् के चरणों की ओर उन्मुख करना चाहिए। ऐसा जीवन ही अन्ततः सुखदायक होता है।

श्लोक में ‘सुखदं यमघ्नम्’ भी महत्वपूर्ण है। भगवान् का स्मरण न केवल मन को सुख देता है, बल्कि ‘यमघ्न’ अर्थात् मृत्यु के भय का नाशक भी है। इसका अर्थ यह नहीं कि स्मरण करने वाला मृत्यु को रोक देता है, बल्कि यह कि मृत्यु उसके लिए भय का कारण नहीं रह जाती। जब आत्मा का सम्बन्ध अपने वास्तविक स्वरूप—परमात्मा—से जुड़ जाता है, तब मृत्यु केवल देह-परिवर्तन प्रतीत होती है, कोई विनाश या हानि नहीं।

‘मुरारि’ नाम स्वयं स्मरण कराता है कि भगवान् वह हैं जिन्होंने मुरा नामक दैत्य का वध किया था—अर्थात् अज्ञान का वध करने वाले, भय का नाश करने वाले। उनके चरण-कमलों का चिन्तन मन को निर्मल करता है, अहंकार को गलाता है और जीवन को सार्थक बनाता है।

इस प्रकार इस श्लोक का उपदेश यह है कि जीवन का वास्तविक लक्ष्य ईश्वरस्मरण और आत्मज्ञान है। यह स्मरण जीवन में भी शान्ति देता है और मृत्यु के समय सर्वोच्च सहारा बनता है। शंकराचार्य का यह उपदेश हमें चेतावनी की तरह याद दिलाता है कि समय अनिश्चित है, मृत्यु निश्चित है—इसलिए बुद्धिमान वही है जो विलम्ब न करके अभी, इसी क्षण, मन को भगवान् की ओर मोड़ दे।