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बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

आदि शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी (मणिरलमाला) का 25वा श्लोक

के दस्यवः सन्ति कुवासनाख्याः कः शोभते यः सदसि प्रविद्यः । 

मातेव का या सुखदा सुविद्या किमेधते दानवशात्सुविद्या । २५।

प्रश्न:-डाकू कौन हैं ?
सभा में शोभा कौन पाता है ?
माता के समान सुख देने वाली कौन है ?
देने से क्या बढ़ती है ?

उत्तर:-बुरी वासनाएँ।
जो अच्छा विद्वान् है।
उत्तम विद्या।
अच्छी विद्या।

व्याख्या:-शंकराचार्य द्वारा रचित प्रश्नोत्तरी का यह श्लोक मानवीय जीवन के गहरे सत्य को अत्यंत सरल, परन्तु प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें जीवन की दिशा, आचरण और आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक मूलभूत संकेत दिए गए हैं। सबसे पहले, “डाकू कौन हैं?”—इस प्रश्न का उत्तर शंकराचार्य “कुवासना” अर्थात् बुरी वासनाओं को बताते हैं। बाहरी डाकू तो मनुष्य की वस्तुएँ ही छीनते हैं, परन्तु आंतरिक कुवासनाएँ जीवन का सर्वस्व लूट लेती हैं—शांति, विवेक, पवित्रता, और आध्यात्मिक उन्नति। क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, घृणा, विषयासक्ति और दम्भ जैसे कुविचार मन को अंधकारमय बनाकर भीतर का खज़ाना छीन लेते हैं। यही कारण है कि इन्हें व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु कहा गया है। जब तक मनुष्य इन कुवासनाओं का नाश नहीं करता, आत्मोन्नति का मार्ग उसके लिए कठिन बना रहता है।

दूसरे प्रश्न में कहा गया है कि सभा में शोभा कौन पाता है? इसका उत्तर है—“जो प्रविद्यः”, अर्थात् जो वास्तव में जानकार, विवेकी और तत्त्वज्ञ हो। किसी सभा की वास्तविक शोभा बाहरी आडंबर या उपस्थिति की भीड़ से नहीं, बल्कि उन लोगों से होती है जो ज्ञान, सद्विचार और सत्य का प्रतिपादन करते हैं। विद्वान व्यक्ति के शब्द न केवल दूसरों को दिशा देते हैं, बल्कि समाज के बौद्धिक और नैतिक स्तर को भी ऊँचा उठाते हैं। इसलिए कहा गया है कि सभा में वही व्यक्ति सम्मान और प्रमुखता का अधिकारी है, जिसकी बुद्धि उज्ज्वल और हृदय निर्मल हो।

तीसरे प्रश्न का उत्तर भी अत्यंत मधुर और प्रेरणादायक है—“माता के समान सुख देने वाली कौन है?” उत्तर है—“सुविद्या।” विद्या मनुष्य का ऐसा सहायक तत्व है जो जीवन भर उसके साथ रहती है, मार्ग दिखाती है, संकटों में रक्षा करती है और अंधकार में प्रकाश बनती है। माता शरीर को जन्म देती है, पर विद्या व्यक्ति को आत्मिक और बौद्धिक जन्म देती है। विद्या के कारण मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को जानने की क्षमता प्राप्त करता है। इसीलिए सद्गुरु और शास्त्र दोनों ही विद्या को ‘माता’ के समान बताते हैं, क्योंकि वह मनुष्य को जीवन की कठिनाइयों से उबारती और उसे सच्चे सुख की ओर ले जाती है।

चौथे प्रश्न में पूछा गया है—देने से क्या बढ़ती है? उत्तर है—“सुविद्या।” यह एक अद्भुत सत्य है कि संसार की अधिकांश वस्तुएँ देने से घटती हैं, परन्तु ज्ञान ही ऐसी वस्तु है जो देने से और बढ़ती है। जब कोई व्यक्ति विद्या, अनुभव और सत्य को दूसरों के साथ बाँटता है, तो न केवल सामने वाला लाभान्वित होता है, बल्कि देने वाले की समझ, दृष्टि और आत्मबल भी और अधिक विकसित होता है। ज्ञान का स्वभाव ही विस्तार है—जितना अधिक उसे दिया जाए, उतना अधिक वह समृद्ध होता है। यही कारण है कि महान शिक्षकों ने सदा ज्ञानदान को सर्वोच्च दान बताया है।

इस प्रकार इस श्लोक में शंकराचार्य मानव जीवन के चार महत्त्वपूर्ण पक्षों—वासनाओं पर विजय, सद्विद्वानों का महत्व, विद्या का मातृस्वरूप, और ज्ञान-वितरण की महत्ता—को अत्यंत सुन्दर ढंग से समझाते हैं। यह शिक्षा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके समय में थी, क्योंकि मनुष्य की मूल समस्याएँ और आवश्यकताएँ सदैव समान रहती हैं।