विद्युच्चलं किं धनयौवनायु-र्दानं परं किञ्च सुपात्रदत्तम् ।
कण्ठङ्गतैरप्यसुभिर्न कार्य किं किं विधेयं मलिनं शिवार्चा । ३० ।
प्रश्न:-बिजली की तरह क्षणिक क्या है ?
सबसे उत्तम दान कौन सा है ?
कण्ठगत प्राण होने पर भी क्या नहीं करना चाहिये और क्या करना चाहिये ?
उत्तर:-धन, यौवन और आयु ।
जो सुपात्र को दिया जाय।
पाप नहीं करना चाहिये और कल्याण रूप परमात्मा की पूजा करनी चाहिये।
व्याख्या:-विद्युत के समान धन, यौवन और आयु का क्षणिक होना मनुष्य को यह स्मरण कराता है कि संसार में जिन वस्तुओं पर वह सबसे अधिक गर्व करता है, वही सबसे शीघ्र नष्ट हो जाती हैं। बिजली की चमक क्षणभर के लिए प्रकट होकर तुरंत लुप्त हो जाती है—उसी प्रकार मनुष्य का धन कब घट जाए, यौवन कब ढल जाए और आयु कब समाप्त हो जाए, यह कोई नहीं जानता। शंकराचार्य इस उपमा से यह दर्शाते हैं कि जीवन की सबसे प्रिय और मूल्यवान लगने वाली वस्तुएँ भी स्थायी नहीं हैं। इसलिए इन पर गर्व करना, इनका अहंकार रखना या इन्हें आधार बनाकर जीवन चलाना बुद्धिमानी नहीं है। इनका उपयोग तो करना है, पर इनसे आसक्त होकर स्वयं को सुरक्षित समझना आत्मवंचना है। विवेकी व्यक्ति इन क्षणभंगुर वस्तुओं को साधन मानता है, साध्य नहीं।
दूसरे प्रश्न का उत्तर—सबसे उत्तम दान वही है जो सुपात्र को दिया जाए—दान के वास्तविक मूल्य को प्रकट करता है। दान का महत्व मात्रा में नहीं, पात्रता में निहित है। यदि दान किसी ऐसे व्यक्ति को दिया जाए जो उसका सदुपयोग नहीं करेगा, तो वह दान व्यर्थ जाता है और कभी-कभी हानि भी पहुँचाता है। परंतु सुपात्र—जो सद्गुणी हो, संयमी हो, धर्मप्रिय हो, तथा दान का उपयोग समाज और स्वधर्म कल्याण के लिए करता हो—उसे दिया गया दान महान पुण्य का कारण बनता है। शंकराचार्य यह संकेत करते हैं कि दान का उद्देश्य अहंकार, यश या दिखावा नहीं है; बल्कि दान वह माध्यम है जिससे व्यक्ति अपने भीतर करुणा और निःस्वार्थता की वृद्धि करता है। सुपात्र को दिया गया दान आत्मशुद्धि का साधन भी बनता है और समाज में धर्म की वृद्धि भी करता है। अतः दान तभी श्रेष्ठ है जब वह सही व्यक्ति, सही उद्देश्य और सही भावना के साथ दिया जाए।
तीसरा प्रश्न मनुष्य के जीवन के अंतिम और निर्णायक क्षणों से जुड़ा है। शंकराचार्य कहते हैं कि कण्ठगत प्राण होने पर भी—अर्थात जब मृत्यु निकट हो—व्यक्ति को पाप नहीं करना चाहिए। यह संदेश अत्यंत गहन है, क्योंकि प्रायः मनुष्य संकट के क्षणों में भ्रमित होकर, भय या मोहवश अनुचित कार्य कर बैठता है। शंकराचार्य चेतावनी देते हैं कि मृत्यु के समय भी मन का संयम और धर्मनिष्ठा नहीं छोड़नी चाहिए। यह सही है कि उस समय देह दुर्बल होती है, मन विचलित होता है, सांसें टूटती हैं, परन्तु ऐसे समय में भी अधर्म की ओर झुकना आत्मा को और अधिक बंधन में डाल देता है। मृत्यु का समय तो वास्तव में ऐसा समय है जब व्यक्ति को पूर्ण शुचिता और सजगता के साथ अपने भीतर भगवद्भाव को जगाना चाहिए।
इसीलिए आगे कहा है कि ऐसे समय—अर्थात जब प्राण कण्ठ में आ गए हों, जीवन समाप्ति के कगार पर हो—भी क्या करना चाहिए? शंकराचार्य का उत्तर है: कल्याणरूप परमात्मा की पूजा। यह पूजा केवल बाह्य नहीं, बल्कि आंतरिक स्मरण, भगवद्भाव, ईश्वर के चरणों में पूर्ण समर्पण है। जब जीवन के सारे सहारे छूट जाते हैं, तब एकमात्र शरण वह परम सत्य होता है जो कभी नष्ट नहीं होता। अंत समय में ईश्वर-स्मरण मनुष्य को भय से मुक्त करता है, संस्कारों को शुद्ध करता है और उसकी चेतना को ऊर्ध्वगति प्रदान करता है। यही कारण है कि मृत्यु के समय भी ईश्वर का चिंतन ही मनुष्य की सबसे बड़ी साधना माना गया है।
इन तीनों उत्तरों को एक सूक्ष्म सूत्र में बाँधा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि शंकराचार्य मनुष्य को अनित्यता, शुद्धता और परम लक्ष्य की ओर प्रेरित कर रहे हैं। धन, यौवन और आयु पर भरोसा न करके जीवन में धैर्य, विवेक और आत्मज्ञान का आश्रय लेना चाहिए। दान जैसे कर्म भी केवल परोपकार नहीं बल्कि आत्मशुद्धि के साधन हैं, यदि वे सुपात्र को दिए जाएँ। और अंत समय में भी अधर्म से दूर रहकर ईश्वर की शरण लेना मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप—आत्मा—के निकट पहुँचाता है।
इस प्रकार यह श्लोक मनुष्य को क्षणभंगुर संसार में रहते हुए भी अनन्त सत्य की ओर प्रेरित करता है। वह बताता है कि जीवन का सार्य—विवेकपूर्वक रहना, पात्र को दान देना, और अंत समय में भी परमात्मा को हृदय में धारण करना—यही सच्चा धर्म है, यही सच्चा कल्याण है।